महिला आरक्षण पर अचानक पलटी पूरी बाजी! लोकसभा में सरकार 2/3 के करीब, क्या शरद पवार ने खोल दी राह The situation regarding women’s reservation has suddenly taken a dramatic turn! The government is nearing the two-thirds majority mark in the Lok Sabha; has Sharad Pawar paved the way?

देश में महिला आरक्षण विधेयक को लेकर चल रही सियासी रस्साकशी के बीच एक बेहद चौंकाने वाला और बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम सामने आ रहा है। लंबे समय से संसद के भीतर सर्वसम्मति और जरूरी आंकड़ों के गणित में उलझे इस ऐतिहासिक कदम को लेकर अब बाजी पूरी तरह पलटती हुई नजर आ रही है। ताजा संसदीय समीकरणों के मुताबिक, केंद्र सरकार लोकसभा में इस बिल को पास कराने के लिए जरूरी दो-तिहाई (2/3) बहुमत के जादुई आंकड़े के बेहद करीब पहुंच चुकी है। राजनीतिक गलियारों में इस वक्त सबसे बड़ी चर्चा इस बात की है कि क्या विपक्षी खेमे के चाणक्य कहे जाने वाले शरद पवार के एक बड़े रणनीतिक कदम ने सरकार के लिए यह राह बेहद आसान कर दी है।

लोकसभा का बदला समीकरण और सरकार का बढ़ता आंकड़ा

महिला आरक्षण को अमलीजामा पहनाने के लिए संविधान संशोधन की जरूरत होती है, जिसके लिए सदन में मौजूद सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत का समर्थन अनिवार्य है। अब तक विपक्ष की कई पार्टियां कोटे के अंदर कोटे (OBC और अल्पसंख्यक महिलाओं के लिए अलग आरक्षण) की मांग को लेकर इस पर कड़ा रुख अपनाए हुए थीं, जिससे आम सहमति नहीं बन पा रही थी। लेकिन हालिया राजनीतिक लामबंदी और पर्दे के पीछे चली लंबी वार्ताओं के बाद, कई क्षेत्रीय दलों के रुख में बड़ा बदलाव देखा गया है। इसके चलते सत्ता पक्ष के पाले में जरूरी सीटों का आंकड़ा तेजी से बढ़ा है और सरकार अब इस मील के पत्थर जैसे कानून को पारित कराने की स्थिति में मजबूती से खड़ी है।

क्या ‘पावर पॉलिटिक्स’ के जरिए शरद पवार ने बदल दिया गेम?

इस पूरे राजनीतिक उलटफेर के केंद्र में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के मुखिया शरद पवार की भूमिका को लेकर कयासों का बाजार बेहद गर्म है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शरद पवार ने महिलाओं को प्रतिनिधित्व देने के इस राष्ट्रीय मुद्दे पर एक बेहद व्यावहारिक और लचीला रुख अख्तियार किया है। उनके इस कदम के बाद विपक्ष के कई अन्य धड़े भी रक्षात्मक मुद्रा में आ गए हैं, क्योंकि कोई भी दल सार्वजनिक मंच पर महिला विरोधी दिखने का जोखिम नहीं उठाना चाहता। पवार के इस परोक्ष समर्थन या रणनीतिक चुप्पी ने उन क्षेत्रीय दलों के हौसले पस्त कर दिए हैं जो इस बिल में अड़ंगा लगाने की तैयारी में थे, जिससे सरकार की राह का कांटा लगभग साफ हो गया है।

आधी आबादी को हक देने वाले इस ऐतिहासिक कानून के क्या हैं मायने?

यदि यह बिल इस बार दो-तिहाई बहुमत से लोकसभा में पारित हो जाता है, तो यह देश की लोकतांत्रिक यात्रा में महिलाओं की हिस्सेदारी को लेकर अब तक का सबसे बड़ा रिफॉर्म (सुधार) होगा। इसके तहत लोकसभा और देश की तमाम राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 फीसदी सीटें आरक्षित हो जाएंगी। इस कानून के लागू होने से न केवल संसद की बनावट बदलेगी, बल्कि नीति निर्धारण और कानून बनाने की प्रक्रियाओं में भी महिलाओं की आवाज को निर्णायक ताकत मिलेगी। चुनाव से ठीक पहले इस बिल का पास होना मौजूदा सरकार के लिए एक बहुत बड़ा मास्टरस्ट्रोक साबित हो सकता है, जो विपक्ष के पूरे चुनावी एजेंडे को ध्वस्त करने की क्षमता रखता है।

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