पेट्रोल पंपों पर UPI पेमेंट पर लगेगा चार्ज, डीलर्स ने वित्त मंत्री से लगाई गुहार, 2000 रुपये से ऊपर MDR छूट की बड़ी मांग

देशभर में कैशलेस अर्थव्यवस्था और डिजिटल इंडिया के विस्तार के बीच ईंधन खुदरा बिक्री क्षेत्र से एक बड़ा और संवेदनशील आर्थिक संकट सामने आया है। ऑल इंडिया पेट्रोलियम डीलर्स एसोसिएशन (AIPDA) ने बुधवार को केंद्रीय वित्त मंत्रालय के समक्ष औपचारिक गुहार लगाते हुए पेट्रोल पंपों पर होने वाले यूपीआई (यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस) भुगतानों पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) और अन्य बैंकिंग सेवा शुल्कों से पूर्ण छूट देने की जोरदार मांग उठाई है। एसोसिएशन ने वित्त मंत्री को भेजे गए एक विस्तृत और आधिकारिक ज्ञापन में साफ किया है कि डिजिटल पेमेंट पर प्रस्तावित या लागू होने वाले किसी भी प्रकार के अतिरिक्त वित्तीय शुल्क सीधे तौर पर पेट्रोल पंप संचालकों के अस्तित्व और उनकी आजीविका पर सीधा प्रहार कर रहे हैं। एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष अजय बंसल ने सरकार से इस मामले में तुरंत उच्चस्तरीय हस्तक्षेप करने की अपील की है ताकि देश के लाखों खुदरा ईंधन आउटलेट्स पर डिजिटल लेनदेन बिना किसी बाधा के सुचारू रूप से जारी रह सके और आम वाहन चालकों को ईंधन भराने में किसी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े।

पेट्रोलियम डीलर्स एसोसिएशन ने वित्त मंत्रालय को भेजे अपने पत्र में पेट्रोलियम खुदरा कारोबार के विशिष्ट और तकनीकी अर्थशास्त्र का विस्तार से उल्लेख किया है। एसोसिएशन के प्रेसिडेंट अजय बंसल ने पत्र में रेखांकित किया कि पेट्रोल पंप डीलरों का मुनाफा किसी सामान्य किराना स्टोर या ई-कॉमर्स विक्रेता की तरह बेचे गए उत्पाद के कुल बिल मूल्य पर आधारित नहीं होता है। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के नियामक दिशा-निर्देशों के तहत सरकारी तेल विपणन कंपनियों (OMCs) द्वारा डीलरों का मार्जिन केवल प्रति लीटर बिक्री की मात्रा के आधार पर एक निश्चित दर पर तय किया जाता है, न कि कुल लेनदेन मूल्य के प्रतिशत के रूप में। इसका सीधा अर्थ यह है कि ईंधन की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार के आधार पर कितनी भी बढ़ जाएं, या ग्राहक 200 रुपये का पेट्रोल ले अथवा 5000 रुपये का, पंप डीलर की कमाई प्रति लीटर तय पैसों में ही सीमित रहती है। डीलरों के पास लेनदेन की ऊंची कीमतों के अनुपात में अपने कमीशन या मुनाफे को बढ़ाने का कोई विधिक या व्यावसायिक रास्ता उपलब्ध नहीं है।

ज्ञापन में इस बात पर गहरा असंतोष व्यक्त किया गया है कि अक्टूबर 2017 के बाद से पिछले नौ वर्षों के दौरान तेल विपणन कंपनियों द्वारा डीलरों के बुनियादी कमीशन मार्जिन में एक पैसे की भी बढ़ोतरी नहीं की गई है। इसके ठीक विपरीत, इस समयावधि में पेट्रोल पंपों के संचालन से जुड़े खर्चों में कई गुना भारी उछाल दर्ज किया गया है। व्यावसायिक बिजली की दरों में भारी वृद्धि, कर्मचारियों और फ्यूल डिस्पेंसिंग अटेंडेंट्स के न्यूनतम वेतनमान में लगातार बढ़ोतरी, अग्निशमन सुरक्षा मानकों के नवीनीकरण और जटिल विनियामक अनुपालनों की लागत ने डीलरों के लाभ मार्जिन को लगभग समाप्त कर दिया है। तेल कंपनियों के साथ कई दौर की द्विपक्षीय बैठकों और वार्ताओं के बावजूद डीलर मार्जिन में संशोधन का यह बुनियादी मुद्दा अनसुलझा बना हुआ है, जिसके कारण अधिकांश खुदरा पंप केवल न्यूनतम परिचालन स्तर पर चलने को मजबूर हैं।

एसोसिएशन ने डिजिटल भुगतान पर लगने वाले वित्तीय अधिभारों के सूक्ष्म प्रभावों का ब्योरा देते हुए बताया कि आम उपभोक्ता के लिए भले ही 2000 रुपये से ऊपर के लेनदेन पर 5 रुपये का फिक्स्ड चार्ज या 0.4 प्रतिशत तक का एमडीआर एक मामूली रकम प्रतीत हो, किंतु पेट्रोल पंपों के दैनिक टर्नओवर के हिसाब से यह एक अत्यंत विनाशकारी वित्तीय भार साबित होगा। पेट्रोल पंपों पर प्रतिदिन हजारों वाहन चालक आते हैं और चौबीसों घंटे लाखों लीटर ईंधन की उच्च मूल्य वाली डिजिटल बिक्री दर्ज की जाती है। यदि कुल डिजिटल लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत का एमडीआर या प्रति ट्रांजैक्शन फिक्स्ड प्रोसेसिंग फीस काटी जाने लगी, तो डीलरों को प्रति लीटर मिलने वाले मामूली कमीशन का एक बड़ा हिस्सा सीधे बैंकों और पेमेंट गेटवे कंपनियों की जेब में चला जाएगा, जिससे डीलरों को अपनी जेब से नुकसान उठाना पड़ेगा।

एसोसिएशन का तर्क है कि ग्राहक चाहे नकद भुगतान करे, डेबिट कार्ड से भुगतान करे या फिर स्मार्टफोन से क्यूआर कोड स्कैन करके यूपीआई करे, ईंधन की भौतिक मात्रा और उसके कारोबार की प्रकृति में कोई बदलाव नहीं आता है। पत्र में ऐतिहासिक संदर्भ का हवाला देते हुए याद दिलाया गया कि वर्ष 2016 के विमुद्रीकरण के बाद जब डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के लिए पेट्रोल पंपों पर डेबिट और क्रेडिट कार्ड स्वाइप पर लगने वाले एमडीआर को लेकर विवाद हुआ था, तब केंद्र सरकार ने ईंधन खुदरा बिक्री की संकीर्ण मार्जिन प्रकृति को स्वीकार किया था और कार्ड स्वाइप पर लगने वाले एमडीआर शुल्क को पूरी तरह समाप्त कर उसका बोझ तेल कंपनियों व बैंकों में समाहित कर दिया था। डीलर्स एसोसिएशन का पुरजोर तर्क है कि डिजिटल इंडिया का सबसे बड़ा माध्यम बन चुके यूपीआई लेनदेन पर भी बिल्कुल वही सिद्धांत, नियम और पूर्ण छूट का दायरा लागू किया जाना चाहिए।

वित्त मंत्री को लिखे पत्र में पेट्रोलियम डीलर्स ने एक बहुत ही गंभीर और व्यावहारिक चेतावनी भी दर्ज कराई है। एसोसिएशन ने कहा कि यदि सरकार ने त्वरित हस्तक्षेप कर यूपीआई पेमेंट पर लगने वाले शुल्कों से पेट्रोल पंपों को संरक्षण नहीं दिया, तो देश के खुदरा पंप संचालक अपनी पहले से ही घटी हुई कमाई को डूबने से बचाने के लिए एक निश्चित वित्तीय सीमा (जैसे 2000 रुपये) से अधिक के यूपीआई भुगतानों को स्वीकार करने से इनकार करने के लिए पूरी तरह विवश हो जाएंगे। यदि पेट्रोल पंपों पर बड़े वाहनों, ट्रकों और कारों में भारी मात्रा में ईंधन भराने के लिए यूपीआई से भुगतान लेने पर रोक लगाई जाती है, तो यह केंद्र सरकार के डिजिटल लेनदेन, वित्तीय पारदर्शिता और व्यापार करने में सुगमता (Ease of Doing Business) के राष्ट्रीय विजन के खिलाफ जाएगा। ग्राहक और पंप कर्मियों के बीच विवाद बढ़ेंगे और राष्ट्रीय राजमार्गों तथा शहरी केंद्रों पर लंबी कतारें लग जाएंगी।

इस संभावित परिचालन संकट को टालने और आम जनता को असुविधा से बचाने के लिए ऑल इंडिया पेट्रोलियम डीलर्स एसोसिएशन ने केंद्र सरकार के समक्ष दो प्रमुख मांगें रखी हैं। एसोसिएशन का पहला और प्राथमिक अनुरोध यह है कि देश के सभी खुदरा ईंधन आउटलेट्स पर होने वाले समस्त यूपीआई भुगतानों को, चाहे लेनदेन की राशि 50 रुपये हो या 50,000 रुपये, एमडीआर और उससे जुड़े सभी इंटरचेंज व प्रोसेसिंग शुल्कों से शत-प्रतिशत स्थायी छूट दी जाए। इसके साथ ही एसोसिएशन ने यह वैकल्पिक सुझाव भी दिया है कि यदि सरकार डिजिटल भुगतान इकोसिस्टम में कोई सामान्य वित्तीय सीमा या थ्रेशोल्ड बनाए रखना चाहती है, तो पेट्रोल पंपों के निरंतर और निर्बाध संचालन को सुनिश्चित करने के लिए रिटेल फ्यूल आउटलेट्स को ₹2,000 से अधिक के यूपीआई भुगतानों पर प्रतिशत-आधारित एमडीआर और प्रति-लेनदेन फिक्स्ड चार्ज, दोनों से स्पष्ट और पूर्ण सुरक्षा कवच प्रदान किया जाए ताकि डिजिटल ईंधन अर्थव्यवस्था पटरी पर बनी रहे।

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