BRICS समिट में पीएम मोदी और शी जिनपिंग की द्विपक्षीय बैठक का बड़ा खुलासा

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और वैश्विक राजनीति के गलियारों में हमेशा से कौतूहल का केंद्र रहे भारत और चीन के शीर्ष नेतृत्व के बीच के संवाद को लेकर आखिरकार केंद्र सरकार ने आधिकारिक और विस्तृत पर्दा उठा दिया है। ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हुई बहुचर्चित द्विपक्षीय बैठक के संबंध में सरकार ने संसद के पटल पर आधिकारिक ब्योरा साझा किया है, जिसने देश-विदेश के राजनीतिक और रणनीतिक विश्लेषकों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। पिछले कुछ वर्षों से पूर्वी लद्दाख की वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर चल रहे सीमा विवाद और तनावपूर्ण संबंधों के बीच हुई इस उच्च स्तरीय आमने-सामने की बातचीत में किन-किन गंभीर मुद्दों पर चर्चा हुई थी, इसको लेकर देश की जनता और विपक्षी दलों के मन में लगातार कई सवाल उठ रहे थे। सरकार द्वारा दिए गए इस आधिकारिक विवरण से यह स्पष्ट हो गया है कि भारत ने अपनी संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर ड्रैगन के सामने कितनी दृढ़ता और स्पष्टता के साथ अपना पक्ष रखा है, जिससे द्विपक्षीय कूटनीति के मोर्चे पर एक नया संदेश पूरी दुनिया में गया है।

यह पूरा कूटनीतिक घटनाक्रम उस समय सामने आया जब दोनों देशों के शीर्ष नेता ब्रिक्स समूह के वार्षिक सम्मेलन में भाग लेने के लिए एक ही मंच पर एकत्र हुए थे। लंबे समय से कूटनीतिक गतिरोध और सैन्य स्तर की वार्ताओं के दौर के बाद दुनिया भर की नजरें इस बात पर टिकी थीं कि क्या भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच कोई औपचारिक द्विपक्षीय संवाद होता है या नहीं। वैश्विक शांति, आर्थिक सहयोग और बहुपक्षीय मंचों की महत्ता को समझते हुए दोनों नेताओं ने इस सम्मेलन के इतर आपसी बातचीत के लिए समय निकाला, ताकि दोनों पड़ोसी देशों के बीच जमे हुए बर्फ को पिघलाया जा सके। हालांकि कूटनीतिक बैठकों में अक्सर औपचारिक शिष्टाचार निभाया जाता है, लेकिन भारत की तरफ से यह साफ कर दिया गया था कि जब तक सीमा पर शांति और स्थिरता बहाल नहीं होती, तब तक सामान्य संबंधों की बहाली संभव नहीं है। इसी पृष्ठभूमि में हुई इस महाबैठक के हर एक पल और शब्द का भू-राजनीतिक दृष्टिकोण से अत्यधिक महत्व माना जा रहा है, क्योंकि एशिया की इन दो महाशक्तियों के संबंध पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित करते हैं।

संसद में पेश किए गए आधिकारिक विवरण के मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ हुई इस द्विपक्षीय बैठक में बहुत ही दो टूक शब्दों में यह बात रखी कि भारत-चीन संबंधों के समग्र विकास के लिए सीमा क्षेत्रों में शांति, स्थिरता और एलएसी (LAC) का पूर्ण सम्मान होना सबसे पहली और अनिवार्य शर्त है। पीएम मोदी ने पूर्वी लद्दाख के शेष बचे विवादित बिंदुओं से सैनिकों के पूर्ण पीछे हटने (Disengagement) और पैट्रोलिंग के अधिकारों को जल्द से जल्द बहाल करने की पुरजोर वकालत की। सरकार की ओर से संसद को यह भी अवगत कराया गया कि दोनों देशों के बीच हुए समझौतों और प्रोटोकॉल का पूरी तरह से पालन किया जाना चाहिए, ताकि सीमा पर किसी भी प्रकार के तनाव की पुनरावृत्ति न हो सके। इस बैठक के बाद से ही दोनों देशों के राजनयिकों और सैन्य कमांडरों के बीच जमीन पर तनाव कम करने की दिशा में जो नए समझौते और गश्त व्यवस्था पर सहमति बनी है, उसे इसी उच्च स्तरीय राजनीतिक संवाद का प्रत्यक्ष परिणाम माना जा रहा है।

केवल सैन्य और सीमा मामलों तक ही यह बैठक सीमित नहीं थी, बल्कि इसमें दोनों देशों के बीच बढ़ते व्यापारिक असंतुलन और आर्थिक मुद्दों पर भी खुलकर चर्चा की गई। भारत द्वारा चीन के साथ बढ़ते व्यापार घाटे (Trade Deficit) और भारतीय बाजारों में चीनी सामानों की पैठ को लेकर समय-समय पर चिंता जताई जाती रही है, जिस पर इस शिखर सम्मेलन के दौरान भी भारतीय पक्ष ने अपनी बात मजबूती से रखी। इसके अलावा, वैश्विक मंचों पर आपसी सहयोग, जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद के खिलाफ साझा लड़ाई और ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूत करने जैसे मुद्दों पर भी दोनों नेताओं के बीच विचारों का आदान-प्रदान हुआ। हालांकि भारत ने स्पष्ट संदेश दिया कि कूटनीतिक और आर्थिक सहयोग तभी आगे बढ़ सकते हैं जब राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय अखंडता के साथ किसी भी प्रकार का समझौता न किया जाए, जो कि भारतीय विदेश नीति की एक बड़ी और दृढ़ सफलता के रूप में देखा जा रहा है।

पीएम मोदी और शी जिनपिंग के बीच हुई इस द्विपक्षीय बातचीत और सरकार द्वारा संसद में दिए गए इस ब्योरे ने यह साबित कर दिया है कि भारत अब अपनी शर्तों पर कूटनीति संचालित करने में पूरी तरह सक्षम है। पड़ोसी देश के साथ दशकों पुराने सीमा विवाद को सुलझाने के लिए जहां एक ओर सैन्य और कूटनीतिक रास्ते खुले रखे गए हैं, वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय सुरक्षा से कभी भी समझौता न करने के रुख को और अधिक मजबूत किया गया है। आने वाले महीनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि चीनी प्रशासन जमीन पर इन वार्ताओं के नतीजों को कितनी ईमानदारी से लागू करता है और क्या दोनों देशों के बीच सामान्य रिश्तों की बहाली का रास्ता पूरी तरह से साफ हो पाता है। फिलहाल, इस आधिकारिक खुलासे ने विपक्ष के सवालों पर विराम लगाने के साथ-साथ यह भी दिखा दिया है कि वर्तमान भारतीय नेतृत्व देश के सामरिक हितों की रक्षा करने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है और हर वैश्विक मंच पर भारत की धमक स्पष्ट रूप से महसूस की जा रही है।

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