पश्चिम बंगाल की राजनीति में ‘फुटबॉल’ केवल एक खेल नहीं, बल्कि जनभावनाओं और तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी के आक्रामक चुनावी अभियानों का सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार रहा है। वर्ष 2021 के ऐतिहासिक विधानसभा चुनाव में जब भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने बंगाल फतह के लिए पूरी ताकत झोंक दी थी, तब ममता बनर्जी ने व्हीलचेयर पर बैठकर मंचों से फुटबॉल उछाली थी और उनका नारा ‘खेला होबे’ (Khela Hobe) पूरे देश की जुबान पर चढ़ गया था। इसी नारे और फुटबॉल के प्रतीक के दम पर उन्होंने भाजपा के विजय रथ को रोकते हुए सत्ता में वापसी की थी। अब नियति और राजनीति का चक्र देखिए—पार्टी में दोफाड़ होने और पारंपरिक ‘घास-फूल’ (Flowers and Grass) चुनाव चिह्न फ्रीज होने के बाद भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने ममता बनर्जी के गुट को चुनाव मैदान में उतरने के लिए ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ (Football Player) सिंबल ही आवंटित कर दिया है।
तृणमूल कांग्रेस के भीतर पार्टी पर वर्चस्व और संगठन के नियंत्रण को लेकर खड़े हुए आंतरिक विवाद के बाद चुनाव आयोग ने ‘इलेक्शन सिंबल्स (रिजर्वेशन एंड अलॉटमेंट) ऑर्डर 1968’ के पैराग्राफ 15 के तहत अंतरिम आदेश जारी किया। आयोग ने स्पष्ट किया कि जब तक दोनों गुटों के वास्तविक बहुमत की अंतिम सुनवाई पूरी नहीं हो जाती, तब तक कोई भी पक्ष मूल नाम ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ और लगभग तीन दशकों से पंजीकृत उसका पारंपरिक चुनाव चिह्न ‘घास-फूल’ इस्तेमाल नहीं कर सकेगा।
आगामी विधानसभा उपचुनावों (नंदीग्राम और रेजीनगर) को देखते हुए आयोग ने दोनों प्रतिद्वंद्वी गुटों से नए नाम और सिंबल के विकल्प मांगे थे, जिसके बाद शुक्रवार को आयोग ने दोनों पक्षों की नई पहचान तय कर दी:
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ममता बनर्जी गुट: पार्टी का नया अंतरिम नाम ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ (Mamata All India Trinamool Congress) और नया चुनाव चिह्न ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ (Football Player)।
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बागी गुट: पार्टी का नया अंतरिम नाम ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ (Democratic Trinamool Congress) और चुनाव चिह्न ‘लिफाफा’ (Envelope)।
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यह अंतरिम व्यवस्था पश्चिम बंगाल, मेघालय और त्रिपुरा राज्यों के लिए प्रभावी की गई है।
ममता बनर्जी के लिए फुटबॉल केवल एक सिंबल नहीं, बल्कि बंगाल की सांस्कृतिक पहचान (मोहन बागान और ईस्ट बंगाल की विरासत) से सीधे जुड़ने का माध्यम है। 2021 के चुनाव में जब ममता बनर्जी ने ‘खेला होबे’ का नारा दिया था, तो उन्होंने बाद में 16 अगस्त को सरकारी स्तर पर ‘खेला होबे दिवस’ घोषित कर राज्य भर के हजारों स्पोर्ट्स क्लबों को लाखों फुटबॉल बांटी थीं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ‘घास-फूल’ जैसा स्थापित सिंबल छिनना किसी भी क्षेत्रीय दल के लिए बड़ा झटका होता है, लेकिन ममता बनर्जी के खाते में ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ का सिंबल आना एक तरह से उनके लिए वरदान जैसा है। उन्हें मतदाताओं को इस नए चुनाव चिह्न से जोड़ने के लिए ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ेगी, क्योंकि बंगाल का वोटर पहले से ही ममता बनर्जी के नाम को फुटबॉल और ‘खेला होबे’ के साथ जोड़कर देखता रहा है।
चुनाव आयोग द्वारा पार्टी का मूल नाम और सिंबल फ्रीज किए जाने पर ममता बनर्जी ने तीखा आक्रोश व्यक्त किया है। उन्होंने इसे लोकतंत्र का “काला दिन” बताते हुए सीधे तौर पर केंद्र सरकार और जांच एजेंसियों पर बदले की राजनीति करने का आरोप लगाया। ममता ने कहा, “यह फैसला एक राजनीतिक दल के अहंकार को संतुष्ट करने के लिए लिया गया है। हमारे कार्यकर्ताओं को प्रताड़ित किया जा रहा है और बैंक खातों को निशाना बनाया जा रहा है। लेकिन हम कभी अपना सिर नहीं झुकाएंगे। ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस मेरी आत्मा है और मैं जब तक जीवित हूं, इससे अलग नहीं हो सकती। हम मैदान में बाउंस बैक करेंगे।”
दोनों गुटों के लिए यह नई पहचान महज कागजी नहीं है, बल्कि आगामी 6 अक्टूबर को होने वाले विधानसभा उपचुनावों में इसकी अग्निपरीक्षा होने जा रही है:
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रेजीनगर सीट: यहां ममता गुट के प्रत्याशी ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ सिंबल पर और बागी गुट के उम्मीदवार ‘लिफाफा’ चुनाव चिह्न पर सीधे आमने-सामने टकराएंगे।
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नंदीग्राम सीट: नंदीग्राम सीट पर राजनीतिक समीकरण काफी रोचक हो गए हैं, जहां ममता बनर्जी ने इंडिया गठबंधन के तहत कांग्रेस उम्मीदवार को समर्थन देने की घोषणा कर दी है, जबकि बागी गुट ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ के बैनर तले मैदान में ताल ठोक रहा है।
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इन उपचुनावों के नतीजे 9 अक्टूबर को आएंगे, जो यह साफ कर देंगे कि बंगाल का आम मतदाता ममता बनर्जी के चेहरे और ‘फुटबॉल’ पर भरोसा जताता है या फिर संगठन से अलग हुए बागी गुट के साथ खड़ा होता है।
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