असम के गोलपारा जिले में निजी कृषि भूमि पर बने 21 आवासीय मकानों पर जिला प्रशासन द्वारा चलाए गए बुलडोजर एक्शन पर गौहाटी हाई कोर्ट ने बेहद सख्त और तल्ख टिप्पणी की है। अदालत ने निष्पक्ष कानूनी प्रक्रियाओं को दरकिनार कर की गई इस त्वरित कार्रवाई पर राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया यह कदम पूरी तरह से कानून और प्रशासनिक शक्तियों का घोर दुरुपयोग प्रतीत होता है। जस्टिस देवाशीष बरुआह की एकल पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए असम सरकार, गोलपारा के जिला आयुक्त और संबंधित सर्कल अधिकारी को नोटिस जारी कर विस्तृत जवाब तलब किया है। अदालत ने इस बात को विशेष रूप से रेखांकित किया कि जिस तरह से 24 घंटे के भीतर लोगों की निजी संपत्तियों को जमींदोज किया गया, वह नागरिकों के बुनियादी संवैधानिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है।
इस विवाद की शुरुआत 5 सितंबर 2026 को हुई जब गोलपारा जिले के मातिया राजस्व क्षेत्र के सर्कल अधिकारी ने 21 भूस्वामियों को एक बेहद संक्षिप्त और हड़बड़ी में तैयार किया गया नोटिस थमाया। इस नोटिस में सभी प्रभावित परिवारों को सख्त अल्टीमेटम देते हुए निर्देश दिया गया था कि वे 24 घंटे के भीतर अपनी निजी कृषि भूमि पर स्थित आवासीय इकाइयों और पक्के ढांचों को खुद अपने हाथों से ध्वस्त कर लें, अन्यथा उन्हें गंभीर प्रशासनिक और कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा। इससे पहले कि ये नागरिक कानूनी सहायता प्राप्त कर पाते या सक्षम न्यायालय में इस मनमाने नोटिस को चुनौती दे पाते, प्रशासन ने 7 सितंबर की तड़के भारी पुलिस बल और बुलडोजरों के काफिले के साथ मौके पर पहुंचकर सभी 21 आवासीय घरों को पलक झपकते ही मलबे के ढेर में तब्दील कर दिया। पीड़ितों में सभी 21 याचिकाकर्ता मुस्लिम समुदाय से संबंध रखते हैं, जिन्होंने बेघर होने के बाद न्याय के लिए सीधे गौहाटी हाई कोर्ट की चौखट पर गुहार लगाई।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकीलों की दलीलों और प्रशासनिक आदेशों की बारीकी से समीक्षा करने के बाद जस्टिस देवाशीष बरुआह ने 11 सितंबर को पारित अपने आदेश में कड़े शब्दों का प्रयोग किया। न्यायमूर्ति ने स्पष्ट किया कि फाइलों और उपलब्ध दस्तावेजों से यह कहीं साबित नहीं होता कि उस क्षेत्र में कोई ऐसी असाधारण आपातकालीन स्थिति या आसन्न आपदा का खतरा मंडरा रहा था, जिसके चलते नागरिकों के आशियानों को ढहाने जैसी अत्यंत कठोर और दंडात्मक कार्रवाई को उचित ठहराया जा सके। अदालत ने दो टूक शब्दों में कहा कि प्रथम दृष्टया प्रशासन ने इस पूरी ध्वस्तीकरण प्रक्रिया में आपदा प्रबंधन विभाग अधिनियम, 2005 के प्रावधानों का खुला दुरुपयोग किया है। प्रशासनिक मशीनरी ने प्राकृतिक आपदाओं और जनसुरक्षा के लिए बने कानून की आड़ लेकर नागरिकों की निजी संपत्ति पर बुलडोजर चला दिया, जो न्यायिक दृष्टि से पूरी तरह अस्वीकार्य और अनुचित है।
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में राज्य के भूमि कानूनों का विस्तृत विश्लेषण करते हुए असम कृषि भूमि (गैर-कृषि उद्देश्य के लिए पुनर्वर्गीकरण और हस्तांतरण का विनियमन) अधिनियम, 2015 का प्रमुखता से हवाला दिया। इस राज्य कानून के सुस्पष्ट वैधानिक प्रावधानों के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति के पास एक बीघा तक की निजी कृषि भूमि है और वह उस पर अपना आवासीय घर बनाता है, तो उसे किसी विशेष प्रशासनिक पुनर्वर्गीकरण या अलग से आधिकारिक अनुमति लेने की बाध्यता नहीं होती, बशर्ते वह निर्माण दो मंजिला ढांचे तक ही सीमित हो। अदालत के संज्ञान में यह तथ्य भी आया कि स्थानीय सर्कल अधिकारी द्वारा जारी किए गए नोटिसों में स्वयं यह दर्ज था कि संबंधित जमीनों के पट्टे कानूनी रूप से याचिकाकर्ताओं के ही वैध स्वामित्व में हैं। जब जमीन वैध पट्टेदारों की निजी संपत्ति थी और कानून के तहत निर्माण की सीमा सुरक्षित थी, तो प्रशासन द्वारा की गई यह मनमानी तोड़फोड़ कानून के शासन पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करती है।
सुनवाई के दौरान जस्टिस बरुआह ने याचिकाकर्ताओं द्वारा अदालत के समक्ष प्रस्तुत किए गए अतिरिक्त हलफनामे का भी गहराई से संज्ञान लिया, जिसमें बुलडोजर कार्रवाई से तबाह हुए घरों, बिखरे घरेलू सामानों की तस्वीरें और आर्थिक नुकसान का विस्तृत ब्योरा कोर्ट के ऑन-रिकॉर्ड दर्ज कराया गया है। न्यायाधीश ने गोलपारा के जिला आयुक्त और मातिया के सर्कल अधिकारी को इस अतिरिक्त हलफनामे पर अपना औपचारिक जवाब दाखिल करने का अंतिम अवसर दिया है। हाई कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि जवाबदेही की जांच में यह साबित हो जाता है कि प्रशासनिक अधिकारियों ने कानून को ताक पर रखकर दुर्भावनापूर्ण और अवैध तरीके से ध्वस्तीकरण किया है, तो अदालत पीड़ितों को हुए वित्तीय और मानसिक नुकसान की भरपाई के लिए राज्य सरकार और दोषी अधिकारियों पर भारी मुआवजा तय करने का सख्त फैसला सुनाएगी। इस ऐतिहासिक मामले की अगली सुनवाई अब 13 अक्टूबर 2026 को निर्धारित की गई है, जिस पर राज्य और देश के कानूनी विशेषज्ञों की नजरें टिकी हुई हैं।
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