संसदीय समिति में कोई प्रस्ताव नहीं आने का कांग्रेस का दावा, सरकारी सूत्रों के दावों को बताया भ्रामक

देश के डिजिटल भुगतान तंत्र की जीवनरेखा बन चुके यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) पर लेन-देन शुल्क लगाए जाने की चर्चाओं और हालिया प्रशासनिक कदमों को लेकर राष्ट्रीय राजनीति में घमासान छिड़ गया है। 2,000 रुपये से अधिक के डिजिटल लेन-देन पर अतिरिक्त चार्ज या टैक्स लगाने के प्रस्तावों का पुरजोर विरोध कर रही मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने केंद्र सरकार के उस आधिकारिक नैरेटिव को सिरे से खारिज कर दिया है, जिसमें दावा किया जा रहा था कि संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति में कांग्रेस सांसदों ने इस पर कोई आपत्ति नहीं जताई थी। कांग्रेस पार्टी ने केंद्र पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया है कि देश के करोड़ों आम उपभोक्ताओं, छोटे दुकानदारों और रेहड़ी-पटरी विक्रेताओं के व्यापक जनआक्रोश से घबराकर सरकारी तंत्र जनता का ध्यान भटकाने के लिए भ्रामक प्रचार और झूठी दलीलों का सहारा ले रहा है।

इस पूरे राजनीतिक गतिरोध की शुरुआत तब हुई जब सरकारी और सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के सूत्रों के हवाले से मीडिया में यह दावा किया गया कि वित्त मामलों की संसदीय स्थायी समिति ने 12 अगस्त को मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) रेवेन्यू फ्रेमवर्क को बिना किसी देरी के अधिसूचित करने और उसे लागू करने की सिफारिश वाली रिपोर्ट को सर्वसम्मति से मंजूरी दी थी। सरकारी सूत्रों का कहना था कि जब इस मसौदा रिपोर्ट को स्वीकृति प्रदान की गई, तब समिति में शामिल पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम, आनंदपुर साहिब सांसद मनीष तिवारी, असम से सांसद और लोकसभा में उपनेता गौरव गोगोई, किशोरी लाल और के. गोपीनाथ सहित कांग्रेस के पांच प्रमुख सांसदों ने कोई औपचारिक असहमति नोट दर्ज नहीं कराया था। सरकार का तर्क था कि संसदीय मंच पर सहमति जताने के बाद अब सार्वजनिक मंचों पर इसका विरोध करना विपक्षी दलों का दोहरा राजनीतिक मापदंड है।

सरकारी सूत्रों के इन दावों पर सीधा प्रहार करते हुए लोकसभा में कांग्रेस के उपनेता गौरव गोगोई ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लंबा स्पष्टीकरण जारी किया। गोगोई ने दो टूक शब्दों में कहा कि संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति के समक्ष हालिया घोषित यूपीआई टैक्स या ट्रांजैक्शन शुल्क पर कोई औपचारिक या विस्तृत चर्चा हुई ही नहीं थी। उन्होंने उजागर किया कि जब केंद्रीय वित्त मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी स्थायी समिति के सदस्यों के साथ परामर्श बैठक के लिए आए थे, तब उनके पास यूपीआई लेन-देन पर कर लगाने अथवा एमडीआर शुल्क तय करने को लेकर कोई लिखित, सुव्यवस्थित या ठोस प्रस्ताव मौजूद नहीं था। गोगोई ने बताया कि समिति के सदस्यों ने डिजिटल भुगतान पर एमडीआर लागू करने की औचित्यहीनता और इसकी वास्तविक आवश्यकता पर गंभीर सवाल खड़े किए थे, लेकिन उस समय वित्त मंत्रालय के प्रतिनिधियों के पास कोई भी संतोषजनक या तथ्यपरक जवाब नहीं था।

सांसद गौरव गोगोई ने केंद्र सरकार की डिजिटल अर्थव्यवस्था नीतियों की तीखी आलोचना करते हुए कहा कि यूपीआई प्रणाली पर किसी भी प्रकार का अतिरिक्त वित्तीय बोझ डालना भारत के घरेलू आर्थिक ढांचे की रीढ़ पर सीधा प्रहार है। उन्होंने आरोप लगाया कि यूपीआई टैक्स की ये नीतियां भारत के करोड़ों छोटे व्यापारियों, स्वतंत्र वेंडरों, स्थानीय किराना स्टोरों और नए उद्यमियों को भारी नुकसान पहुंचाएंगी, जबकि इसका सीधा रणनीतिक और वित्तीय लाभ बड़े बहुराष्ट्रीय निगमों और दिग्गज अमेरिकी वित्तीय टेक कंपनियों को मिलेगा। गोगोई ने प्रधानमंत्री से सीधे अपील करते हुए मांग की कि सरकार आम नागरिकों और छोटे कारोबारियों के हितों की रक्षा करते हुए इस जनविरोधी यूपीआई टैक्स नीति को तत्काल प्रभाव से वापस ले और वैश्विक दबाव के आगे घुटने टेकना बंद करे।

वरिष्ठ कांग्रेस सांसद और प्रख्यात कानूनविद् मनीष तिवारी ने गौरव गोगोई के बयानों का पुरजोर समर्थन करते हुए संसदीय परंपराओं के हनन पर गहरी चिंता व्यक्त की। तिवारी ने कहा कि संसदीय स्थायी समितियों की आंतरिक कार्यप्रणाली, बैठकें और विमर्श अत्यंत गोपनीय और विशेषाधिकार प्राप्त होते हैं, जिनका उपयोग सरकार अपनी छवि चमकाने और राजनीतिक वाहवाही बटोरने के लिए भ्रामक लीक के जरिए कर रही है, जो बेहद निंदनीय है। मनीष तिवारी ने विस्तार से स्पष्ट किया कि यूपीआई ट्रांजैक्शन पर लगने वाले एमडीआर फ्रेमवर्क की दरें, लेन-देन की मात्रा, शुल्क की निर्धारित राशि, अधिकतम सीमा (कैपिंग) और राहत भरे छूट स्लैब जैसे मूलभूत तकनीकी मापदंड कभी भी वित्त समिति के पटल पर औपचारिक विचार के लिए नहीं रखे गए। बैठकों में सांसदों ने केवल इस बात पर गहरी चिंता जताई थी कि यदि कैशलेस इकॉनमी में जनभागीदारी बढ़ानी है, तो ऐसे अतिरिक्त शुल्कों से डिजिटल क्रांति को गंभीर झटका लगेगा। तिवारी ने कहा कि समिति के ‘कुछ सदस्यों’ द्वारा सहमति दिए जाने की बात फैलाना पूरी तरह से मनगढ़ंत और झूठी कहानी है।

कांग्रेस पार्टी के संचार मामलों के प्रभारी महासचिव जयराम रमेश ने भी इस विवाद में कूदते हुए सरकार के आधिकारिक तंत्र को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने विदेशी कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए यूपीआई पर अतिरिक्त शुल्क का रास्ता खोलने की जो अनुचित कोशिश की है, उसका पूरे देश में स्वतःस्फूर्त और जबर्दस्त विरोध हो रहा है। आम नागरिक से लेकर व्यापारिक संगठन इस टैक्स के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि इस भारी जनआक्रोश और व्यापक विरोध से बचने तथा अपनी किरकिरी छुपाने के लिए ही मोदी सरकार संसदीय कार्यवाही की आड़ में मनगढ़ंत प्रचार करवा रही है। उन्होंने दोहराया कि कांग्रेस पार्टी डिजिटल इंडिया के नाम पर जनता की जेब काटने वाले किसी भी गुप्त या प्रत्यक्ष यूपीआई शुल्क के खिलाफ संसद से लेकर सड़क तक संघर्ष जारी रखेगी।

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