प्राइवेट स्कूलों के शिक्षकों के लिए एक समान वेतन और पेंशन की मांग, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों से मांगा जवाब
भारतीय शिक्षा प्रणाली की रीढ़ कहे जाने वाले शिक्षकों के अधिकारों, उनके कल्याण और उनके भविष्य की सुरक्षा से जुड़ा एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील मामला देश की सर्वोच्च अदालत में पहुंच गया है। लाखों निजी शिक्षकों के जीवन में एक बड़ा और सकारात्मक बदलाव लाने की संभावनाओं को टटोलते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने देश भर के प्राइवेट स्कूलों के शिक्षकों के लिए एक समान वेतनमान, पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभों की मांग वाली याचिका पर कड़ा संज्ञान लिया है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की अवकाशकालीन या विशेष पीठ ने इस जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार, सभी राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद यानी एनसीटीई (NCTE) को औपचारिक रूप से नोटिस जारी कर दिया है। अदालत ने इन सभी पक्षों को स्पष्ट निर्देश दिया है कि वे आगामी चार सप्ताह के भीतर इस मामले में अपना विस्तृत जवाब दाखिल करें। इस कानूनी कदम ने देश के करोड़ों छात्रों को पढ़ाने वाले और लाखों निजी शिक्षकों के परिवारों में एक नई उम्मीद की किरण जगा दी है, क्योंकि दशकों से उपेक्षित रहे इस वर्ग के लिए यह पहली बार है जब अदालत के स्तर पर नीतिगत सुधार की सुगबुगाहट इतनी जोरशोर से शुरू हुई है।
देश के विभिन्न मान्यता प्राप्त निजी विद्यालयों में शिक्षण कार्य कर रहे लाखों शिक्षकों की आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा की मांग को लेकर यह जनहित याचिका ‘ऑल-इंडिया टीचर्स फेडरेशन’ की नेशनल कोऑर्डिनेटर लिगीमोल जॉर्ज की ओर से उनके विद्वान अधिवक्ता दीपक प्रकाश के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय में दायर की गई है। याचिकाकर्ता ने अदालत के समक्ष इस बात को जोर देकर उठाया है कि भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश में जहां एक तरफ सरकारी शिक्षकों को तमाम तरह के वित्तीय लाभ, सुनिश्चित पेंशन, समय-समय पर वेतन आयोगों का फायदा और अन्य सामाजिक सुरक्षा कवच मिलते हैं, वहीं दूसरी तरफ प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षक अपनी योग्यता और अनुभव के बावजूद इन सभी बुनियादी अधिकारों से वंचित रह जाते हैं। याचिका में सुप्रीम कोर्ट से यह मांग की गई है कि वह केंद्र सरकार को यह निर्देश दे कि वह एक निश्चित समय-सीमा के भीतर देश भर के प्राइवेट स्कूलों के शिक्षकों के कल्याण, उनके कार्य की दशाओं और रिटायरमेंट के बाद के जीवन को सुरक्षित बनाने के लिए एक व्यापक राष्ट्रीय नीति (Comprehensive National Policy) का निर्माण करे। वर्तमान परिदृश्य में स्थिति यह है कि देश के अलग-अलग राज्यों में और अलग-अलग निजी संस्थानों के अपने निजी नियम व शर्तें हैं, जिसके कारण एक समान योग्यता रखने वाले शिक्षकों को भी अलग-अलग संस्थानों में बेहद असमान और कम वेतन मिलता है, जिससे उनका जीवन स्तर प्रभावित होता है।
याचिका में भारतीय संविधान के विभिन्न अनुच्छेदों और कानूनी प्रावधानों का हवाला देते हुए यह तर्क दिया गया है कि प्राइवेट स्कूलों के शिक्षक भी संविधान के अनुच्छेद 21A के तहत देश के बच्चों को शिक्षा के अधिकार जैसे महत्वपूर्ण संवैधानिक आदेश को आगे बढ़ाने का एक बेहद जरूरी सार्वजनिक कार्य करते हैं। इसके बावजूद उनके लिए कोई एक समान और मजबूत केंद्रीय कानूनी ढांचा या राष्ट्रीय नीति मौजूद नहीं है। उनकी नौकरी की शर्तें पूरी तरह से राज्य-दर-राज्य के स्थानीय कानूनों, स्कूल प्रबंधन के स्वार्थी तौर-तरीकों और संस्थानों की मनमानी पर निर्भर करती हैं। इस विसंगति के कारण एक ही पद और योग्यता वाले शिक्षकों को अलग-अलग राज्यों और स्कूलों में जमीन-आसमान का अंतर रखने वाले लाभ मिलते हैं। याचिकाकर्ता ने अदालत का ध्यान इस ओर आकर्षित किया है कि देश के संविधान के नीति निर्देशक तत्वों (Directive Principles of State Policy) के अंतर्गत आने वाले अनुच्छेद 38, 39, 41, 42 और 43 के प्रावधान नागरिकों के लिए न्याय, काम की उचित दशाओं और सामाजिक सुरक्षा की गारंटी देते हैं, लेकिन निजी क्षेत्र के शिक्षकों के मामले में इन सिद्धांतों का पालन जमीनी स्तर पर नहीं हो पा रहा है। अदालत को बताया गया कि शिक्षकों का यह वर्ग देश की भावी पीढ़ी को गढ़ने का सबसे कठिन और पवित्र कार्य करता है, इसलिए उनके अधिकारों और भविष्य की रक्षा के लिए सरकार की ओर से एक पुख्ता और पारदर्शी तंत्र का होना निहायत जरूरी है।
इस जनहित याचिका का एक सबसे मानवीय और महत्वपूर्ण पहलू प्राइवेट स्कूलों के शिक्षकों के स्वास्थ्य और वृद्धावस्था की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। याचिका में इस बात को प्रमुखता से उठाया गया है कि देश भर के मान्यता प्राप्त निजी स्कूलों में पढ़ाने वाले लाखों शिक्षक बिना किसी पर्याप्त पेंशन लाभ, चिकित्सा सहायता (Medical Assistance), स्वास्थ्य बीमा (Health Insurance) सुरक्षा और विकलांगता सहायता के ही अपनी लंबी सेवा के बाद रिटायर हो जाते हैं। इन गंभीर कमियों के कारण अधिकांश निजी शिक्षक अपने बुढ़ापे के दिनों में या जीवन की किसी भी आपातकालीन चिकित्सीय स्थिति के दौरान भारी आर्थिक तंगी और लाचारी का सामना करने के लिए मजबूर हो जाते हैं। एक तरफ जहां समाज के अन्य तमाम संगठित और कुछ विशेष असंगठित क्षेत्रों के श्रमिकों के लिए सरकार ने विशेष कल्याणकारी बोर्ड और योजनाएं बना रखी हैं, वहीं देश का पेट पालने वाले और बच्चों का भविष्य उज्जवल करने वाले शिक्षक इस सुरक्षा चक्र से पूरी तरह बाहर हैं। याचिका में इस बात की तुलना भी की गई है कि देश में भवन एवं अन्य निर्माण श्रमिकों, बीड़ी श्रमिकों, सिनेमा श्रमिकों, मछुआरों, पत्रकारों और अन्य विभिन्न कमजोर वर्गों के लिए जिस प्रकार विशेष कल्याणकारी व्यवस्थाएं और सामाजिक सुरक्षा कानून बनाए गए हैं, उसी तर्ज पर निजी शिक्षकों के लिए भी राष्ट्रीय स्तर पर एक अलग कल्याण बोर्ड या तंत्र का गठन किया जाना चाहिए ताकि उन्हें बुढ़ापे में दर-दर न भटकना पड़े।
याचिका के समर्थन में आधिकारिक सरकारी आंकड़ों का हवाला देते हुए देश के शिक्षा ढांचे की एक बहुत बड़ी तस्वीर अदालत के सामने रखी गई है। शिक्षा मंत्रालय के आधिकारिक UDISE+ 2023–24 के आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान में पूरे भारत में लगभग 14.72 लाख स्कूल संचालित हो रहे हैं, जिनमें 98 लाख से अधिक शिक्षक अपनी सेवाएं दे रहे हैं और इन स्कूलों में लगभग 24.8 करोड़ छात्र अपनी शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। इन विशाल आंकड़ों के बीच यदि केवल निजी क्षेत्र की बात की जाए, तो देश के मान्यता प्राप्त प्राइवेट स्कूलों में अकेले 37,30,047 शिक्षक कार्यरत हैं। यानी लगभग साढ़े सैंतीस लाख से अधिक शिक्षक इस समय देश की निजी शिक्षा व्यवस्था को संभाल रहे हैं, जो कुल शिक्षक आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा बनाते हैं। इतनी बड़ी संख्या में देश के युवाओं को शिक्षित करने वाले इस शिक्षक वर्ग की उपेक्षा करना देश की समग्र शिक्षा गुणवत्ता के लिए भी किसी झटके से कम नहीं है। जब तक शिक्षकों को आर्थिक रूप से सुरक्षित और मानसिक रूप से तनावमुक्त माहौल नहीं मिलेगा, तब तक वे पूरी क्षमता के साथ शिक्षण कार्य में अपना योगदान नहीं दे पाएंगे। अब जबकि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले का स्वतः संज्ञान लेते हुए केंद्र और राज्य सरकारों से चार सप्ताह के भीतर जवाब तलब कर लिया है, तो देश भर के निजी शिक्षकों की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सरकारें अदालत में क्या हलफनामा दाखिल करती हैं और क्या वाकई इन लाखों शिक्षकों के जीवन में एक समान वेतन और पेंशन का नया सवेरा देखने को मिलेगा या नहीं।
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