सोनिया गांधी की बहुप्रतीक्षित आत्मकथा ‘बिलोंगिंग’ 10 नवंबर को होगी रिलीज, राजनीति, प्यार और पारिवारिक त्रासदियों का होगा खुलासा

भारतीय राजनीति के सबसे प्रभावशाली चेहरों में शुमार और यूपीए chairperson सोनिया गांधी की जीवन यात्रा पर आधारित आत्मकथा ‘बिलोंगिंग’ (Belonging) आगामी 10 नवंबर को प्रकाशन के लिए तैयार है। इस किताब के आने से पहले ही राजनीतिक गलियारों में सुगबुगाहट तेज हो गई है। यह 544 पन्नों की संस्मरण पुस्तक जाने-माने प्रकाशक ‘अल्फ्रेड ए. नॉफ़’ द्वारा रिलीज की जा रही है, जो पेंगुइन रैंडम हाउस का एक प्रमुख हिस्सा है। इस किताब में सोनिया गांधी की राजनीति से लेकर उनके निजी जीवन, गहरे संघर्षों और इटली से भारत तक के सफर की बेहद मार्मिक और दिलचस्प कहानियां बयां की गई हैं।

कैम्ब्रिज की गलियों से शुरू हुई प्रेम कहानी

पेंगुइन रैंडम हाउस की आधिकारिक जानकारी के अनुसार, इस किताब की शुरुआत इंग्लैंड के कैम्ब्रिज शहर से होती है, जहां साल 1965 में 19 साल की छात्रा सोनिया माइनो की मुलाकात भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के पौत्र और पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी से हुई थी और उन्हें पहली नजर में ही प्रेम हो गया था। किताब में उनकी प्रभावशाली सास और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से पहली मुलाकात का भी जिक्र है। इसमें यह भी बताया गया है कि कैसे राजीव गांधी के साथ रहते हुए सोनिया ने धीरे-धीरे आत्मविश्वास हासिल किया, हिंदी बोलना सीखा, भारतीय साड़ियों को अपनाना शुरू किया और भारतीय संस्कृति व खान-पान को आत्मसात किया।

बड़ी त्रासदियां और राजनीतिक सफर के उतार-चढ़ाव

सोनिया गांधी की जिंदगी खुशियों के साथ-साथ कई बड़ी और असहनीय त्रासदियों से भी गुजरी है। इस संस्मरण में उनके जीवन के उन काले अध्यायों का भी जिक्र है, जब राजीव गांधी के भाई संजय गांधी की एक विमान दुर्घटना (Plane Crash) में असमय मौत हो गई थी और साल 1984 में इंदिरा गांधी की निर्मम हत्या कर दी गई थी। सास की हत्या के बाद और खुद के गहरे डरे होने के बावजूद, देश के राजनीतिक हालातों को देखते हुए राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री बने थे। हालांकि, इसके ठीक सात साल बाद चुनाव प्रचार के दौरान एक आत्मघाती हमले में राजीव गांधी की भी हत्या कर दी गई। इन तमाम दुखों को झेलने के बाद सोनिया गांधी ने लंबे समय तक राजनीति में आने के दबाव का विरोध किया, लेकिन बाद में परिस्थितियों के चलते उन्होंने इंडियन नेशनल कांग्रेस की कमान संभाली और पार्टी की सबसे लंबे समय तक अध्यक्ष रहीं।

2004 में प्रधानमंत्री पद ठुकराने का ऐतिहासिक फैसला

किताब और उनके राजनीतिक जीवन का एक सबसे बड़ा और चर्चित अध्याय साल 2004 का है। लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस ने 14 सहयोगी दलों के साथ मिलकर UPA गठबंधन बनाया था, जिसे लेफ्ट समेत कई अन्य दलों का भी समर्थन प्राप्त हुआ और संसद में 335 सांसदों का समर्थन हासिल हुआ। सभी सहयोगियों की इच्छा थी कि सोनिया गांधी देश की प्रधानमंत्री बनें, लेकिन उन्होंने 18 मई 2004 को खुद को इस पद से अलग करने का ‘हैरान करने वाला फैसला’ किया।

विपक्षी दल एनडीए (NDA) द्वारा उनके विदेशी मूल के होने का मुद्दा उठाए जाने और राजनीतिक गतिरोध के बीच उन्होंने प्रधानमंत्री पद की कुर्सी ठुकरा दी और इसके बजाय डॉ. मनमोहन सिंह को देश का प्रधानमंत्री बनाने का ऐतिहासिक प्रस्ताव रखा। हालांकि, राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा हमेशा आम रही कि पर्दे के पीछे रहकर सरकार की मुख्य बागडोर और दिशा-निर्देश सोनिया गांधी के हाथों में ही रहे।

भारत के छह दशकों के इतिहास का अनूठा दस्तावेज

प्रकाशकों का यह भी कहना है कि यह किताब केवल सोनिया गांधी के व्यक्तिगत जीवन की कहानी नहीं है, बल्कि यह आजादी के बाद के भारत के राजनीतिक इतिहास, सामाजिक बदलावों और पिछले 60 वर्षों के दौरान देश में आए आर्थिक व वैचारिक उतार-चढ़ाव को देखने का एक अनूठा और स्पष्ट नजरिया भी प्रदान करती है।

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