विकसित भारत@2047, शिक्षा, अनुसंधान एवं नवाचार

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डॉ. कल्पना बोरा
लोकसभा में 1 फरवरी 2026 को प्रस्तुत केंद्रीय बजट का एक मुख्य बिंदु भारतीय अर्थव्यवस्था को मध्य-आय वाले विकसित राष्ट्र के स्तर पर ले जाना है। उत्पादन क्षेत्र को बढ़ावा देने और देश में अंतरराष्ट्रीय मानकों के बराबर गुणवत्तापूर्ण उत्पाद बनाने पर बल दिया गया है। इसके लिए प्रौद्योगिकी में नवाचार की आवश्यकता है और नवाचार को बुनियादी विज्ञान में अनुसंधान से ऊर्जा मिलती है। देश में उत्पादित शोध (पीएचडी) की गुणवत्ता और मात्रा अनुसंधान, नवाचार तथा प्रद्योगिकी तंत्र का स्वास्थ्य निर्धारित करती है। हमारी समस्या संख्या में नहीं, बल्कि पीएचडी की गुणवत्ता में है। हर क्षेत्र में उत्कृष्टता समय की मांग है!

हमारे सामने प्रश्न यह है – “भारत प्रभावशाली शोध प्रकाशनों और नवाचारों में क्यों पीछे हैं?”

अनुसंधान अवसंरचना और विश्वविद्यालयों की भूमिका

राज्यिक विश्वविद्यालयों में अनुसंधान अवसंरचना (Infrastructure) को ऊपर उठाना

एनईपी 2020 के एक विजन में कहा गया है कि उच्च शिक्षा के संस्थानों को मात्र डिग्री प्रदान करने वाले संस्थानों से ‘सीखने’ के संस्थानों में बदलना होगा और छात्रों को ‘समस्या समाधान’ के लिए सशक्त बनाना होगा। केंद्र सरकार रिसर्च प्रयोगशालाएँ और संस्थान अकेले यह कार्य नहीं कर सकते, विश्वविद्यालयों को विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी नवाचारों में बहुत बड़ा योगदान देना होगा। इसे सुनिश्चित करने के लिए हमें व्यवस्था की बीमारियों को समझना चाहिए:

संकाय भर्ती (Faculty recruitment) : सर्वोत्तम गुणवत्ता वाले अध्यापकों/वैज्ञानिकों की भर्ती होनी चाहिए। हमारे प्रतिभाशाली सम्पद जो विदेश में शिक्षा/प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद भारत वापस लौटना चाहते हैं, उन्हें अवश्य भर्ती किया जाना चाहिए।

शैक्षणिक, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी अवसंरचना

एक जीवंत शैक्षणिक वातावरण एवं अनुसंधान-संस्कृति की आवश्यकता

यदि स्कूल/कॉलेज का वातावरण छात्रों को विज्ञान पढ़ने के लिए प्रेरित करे और उन्हें ‘अज्ञात को जानने’ के लिए उत्साहित करे, तो हम उसे जीवंत शैक्षणिक वातावरण कह सकते हैं। इसके लिए अध्यापकों को छात्रों को अनुप्रेरित करना चाहिए। अध्यापकों द्वारा नियमित रूप से राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय प्रसिद्ध वैज्ञानिकों के मिलकर साथ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के रोचक विकास पर सेमिनार आयोजित किए जाने चाहिए । विश्वविद्यालयों में पोस्टडॉक्टरल अवसर उपलब्ध हों और राज्यिक विश्वविद्यालय ‘स्थानीय रूप से महत्वपूर्ण किंतु वैश्विक रूप से प्रासंगिक’ अनुसंधान में संलग्न हों।

शोध गुणवत्ता बनाम संख्या की चुनौती

अनुसंधान पत्रों (paper) की गुणवत्ता पर ध्यान दें, मात्रा पर नहीं

अनुसंधान सूचकांक (RI) शोध पत्रों के उद्धरणों की संख्या तय करता है; सूचकांक जितना ऊँचा, शोध प्रकाशनों की गुणवत्ता उतनी बेहतर। इस सूचकांक का क्रम इस प्रकार है –

अमेरिका 1.9 ; ईयू 1.3 ; चीन 1.2 ; भारत 0.9

भारत संख्या में अधिक प्रकाशन कर रहा है, लेकिन गुणवत्ता में पीछे है। हम एक ऐसी व्यवस्था बना रहे हैं जो संख्या के माध्यम से प्रभाव दर्शाने पर आधारित है, न कि प्रभावशाली अनुसंधानों (Breakthrough) पर। इस समस्या का एक समाधान यह हो सकता है कि पदोन्नति का मानदंड शोध पत्रों की गुणवत्ता पर आधारित होना चाहिए, मात्रा पर नहीं।

विदेश के शीर्ष संस्थान से आने वाला वैज्ञानिक मात्र छह बेहतरीन गुणवत्ता वाले पत्रों (Research paper) के साथ हमारी घरेलू संस्थाओं की नियुक्ति की शर्त पूरी नहीं कर पाएगा, क्योंकि वहाँ न्यूनतम 10/15 पत्रों की माँग की जाती है। हमें गंभीर कदाचार (Malpractice) जैसे प्लेगियारिज्म, डेटा हेराफेरी, शुल्क लेकर न्यूनतम समीक्षा (Review) से प्रकाशन की गारंटी देने वाले शिकारी जर्नलों से बचना चाहिए, जो पदोन्नति के लिए अधिक पत्र प्रकाशित करने के दबाव से प्रेरित है।

उत्कृष्टता के लिए परिवर्तनकारी शोध-कार्य को तब भी समर्थन देने का साहस चाहिए जब वह पर्याप्त संख्या में शोध पत्र न दे। एक उत्कृष्ट अनुसंधान प्रतिष्ठित करने में दशकों लगते हैं। एमआईटी (MIT, USA), 30 वर्षों तक तात्कालिक परिणामों की माँग किए बिना, प्रतिबद्धता बनाए रखकर ही एमआईटी बना।

प्रतिभा पलायन और वापसी की आवश्यकता

अपने विदेश में शिक्षित प्रतिभाओं को भारत वापस लौटने पर भर्ती करें

दुर्भाग्यवश, यह आम घटना है कि हमारे प्रतिभाशाली वैज्ञानिक युवा-सम्पद जो शिक्षा के लिए विदेश जाते हैं, जब अपने भारत वापस लौटना चाहते हैं तो हमारे शैक्षिक, प्रौद्योगिक तथा अनुसंधान संस्थानों का पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) उनके लिए अप्रिय विकर्षक बन जाता है। जब ये हमारे प्रतिभाशाली युवा-सम्पद स्थायी वैज्ञानिक/संकाय पदों के लिए संस्थानों/विश्वविद्यालयों में आवेदन करते हैं, तो उन्हें वह प्रतिक्रिया नहीं मिलती जो उन्हें मिलनी चाहिए। हमारी व्यवस्था ने जो पैदा किया उसे अवशोषित करने की क्षमता खो दी है। संस्थान के आंतरिक पारिस्थितिकी तंत्र, समुदाय, क्षेत्र या अनुसंधान क्षेत्र से समर्थित लॉबीज अक्सर प्रतिभा की परवाह किए बिना तय करती हैं कि कौन भर्ती होगा।

2008 में चीन ने ‘थाउजेंड्स टैलेंट प्लान’ शुरू किया, जिसमें विदेश से लौटने वाले प्रतिभाशालियों को एक मिलियन युआन का प्रारंभिक बोनस, उदार अनुसंधान फंडिंग, आवास सब्सिडी, भोजन भत्ता, घरेलू यात्रा भत्ता और बच्चों की पढ़ाई की सब्सिडी दी गई। भारत यह क्यों नहीं कर सकता? यदि कोई प्रतिभाशाली वैज्ञानिक किसी और की प्रयोगशाला में काम करे, तो यह उस प्रतिभा को खो देने समान ही है, जो हमारे भारतीय संसाधनों में योगदान दे सकती थी।

ये हमारे वैज्ञानिक और अनुसंधान पारिस्थितिकी तंत्र को गंभीर नुकसान पहुँचा रहे हैं और राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध हैं।

नीति, शिक्षक गुणवत्ता और फंडिंग का महत्व

NEP2020 का समग्र कार्यान्वयन

एनईपी 2020 एक बहुत महत्वाकांक्षी शिक्षा नीति है, जो बच्चों के समग्र विकास पर केंद्रित है – उन्हें कौशल और मूल्य शिक्षा प्रदान करना, प्राचीन भारत के ज्ञान एवं बुद्धिमत्ता, विज्ञान, अर्थव्यवस्था तथा ज्ञान प्रणाली से अवगत कराना, इसके उद्देश्यों में से एक है । इसका उद्देश्य मूल्यवान मानव संसाधन उत्पन्न करना भी है जो राष्ट्र निर्माण में योगदान देगा और मातृभूमि की सेवा करेगा। इसलिए एनईपी 2020 का समग्र कार्यान्वयन अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके लिए सभी हितधारकों , इसे बोझ ना समझते हुए, इसे समग्रता से लागू करने की तीव्र इच्छा होनी चाहिए। शिक्षकों, माता-पिता और नीति-निर्माताओं का मानसिकता परिवर्तन आवश्यक है।

औद्योगिक-अकादमिक साझेदारी, कौशल पर फोकस, ऑनलाइन शिक्षा, मूल्य शिक्षा – ये सभी एनईपी 2020 के अंतर्गत शिक्षा के अभिन्न अंग हैं।

स्कूलों और कॉलेजों में शिक्षकों की गुणवत्ता

भारत की शिक्षा व्यवस्था की एक प्रमुख समस्या स्कूलों और कॉलेजों में (सरकारी और निजी दोनों) शिक्षकों की गुणवत्ता है। इसे दूर करने के लिए:

• बी.एड. कार्यक्रम को अधिक गहन बनाया जाए।
• परीक्षा में उच्च अंक प्राप्त करना ही किसी व्यक्ति को अच्छा शिक्षक नहीं बनाता। व्याख्यान देने की विधि, छात्रों से जुड़ने और उन्हें जोड़ने की पद्धति अत्यंत महत्वपूर्ण है।
• शिक्षकों को शिक्षण पद्धति के नवीनतम विकास (ब्लेंडेड मोड सहित) के साथ कदम मिलाकर चलना चाहिए। इसके लिए नियमित प्रशिक्षण कार्यक्रम/रीफ्रेशर कोर्स आयोजित किए जाएँ।

स्कूल शिक्षा उच्च शिक्षा की रीढ़ है। इसलिए एनईपी के साथ समन्वय में स्कूल शिक्षा की गुणवत्ता पर अधिकतम ध्यान दिया जाए।

शिक्षा एवं अनुसंधान पर फंडिंग

विकसित (तथा अग्रणी) अर्थव्यवस्थाएँ अपनी जीडीपी का लगभग 6%-7.5% शिक्षा पर खर्च करती हैं – जापान 7.4%, चीन 6.1%, अमेरिका 6%, यूके 6% से अधिक। एनईपी 2020, कोठारी आयोग (1966) की पुरानी सिफारिश को पुनः दोहराती है कि शिक्षा पर सार्वजनिक निवेश को जीडीपी का 6% करने का लक्ष्य होना चाहिए ।

भारत 2015 से 2025 के बीच लगातार अपनी जीडीपी का 4.1%-4.6% ही शिक्षा पर आवंटित करता रहा है।

सितंबर 2025 में प्रकाशित ओईसीडी, मेन साइंस एंड टेक्नोलॉजी इंडिकेटर्स (एमएसटीआई) डेटाबेस, मार्च 2025 (https://oe.cd/msti
) के अनुसार, जीडीपी के प्रतिशत में R&D पर सकल घरेलू (Gross Domestic ) व्यय इस प्रकार है:

इजराइल 6.35%; कोरिया 4.96%; यूएसए 3.45%; जर्मनी 3.11%; चीन 2.58%; ऑस्ट्रेलिया 1.66%; स्पेन 1.49%; इटली 1.31%, भारत 0.6-0.7%

pib.gov.in के अनुसार, भारत का सकल अनुसंधान एवं विकास व्यय (जीईआरडी) जीडीपी का मात्र 0.6-0.7% है। इसलिए स्पष्ट है कि भारत को नवाचार को उत्प्रेरित करने के लिए शिक्षा और अनुसंधान क्षेत्र में बजट आवंटन बढ़ाना ही होगा।

विकसित भारत@2047: लक्ष्य और आगे की दिशा

विकसित भारत@2047
यह भारत सरकार की 2023 में प्रधानमंत्री मोदी जी द्वारा आरंभ किया गया विजन है। ‘विकसित’ का अर्थ है – भारत को एक विकसित राष्ट्र में बदलना, जिसमें समावेशी आर्थिक विकास, सामाजिक प्रगति, पर्यावरणीय स्थिरता, शांति और सुशासन सहित विकास के विभिन्न पहलू शामिल हैं, जिसमें युवाओं की भागीदारी पर विशेष ध्यान दिया गया है। इस विजन के चार स्तंभ हैं –

“युवा, गरीब, महिला, अन्नदाता (किसान)”

विकसित भारत@2047 के उद्देश्य हैं –

“शून्य गरीबी, 100% गुणवत्तापूर्ण स्कूल शिक्षा, उच्च गुणवत्ता, सस्ती और समग्र स्वास्थ्य सेवा तक पहुँच, 100% कुशल श्रमिक, 70% महिलाएँ आर्थिक गतिविधियों में भागीदार बनें “

शिक्षा, अनुसंधान और नवाचार ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं और जो राष्ट्र इसे प्राप्त एवं उपयोग करेगा, वही कल की प्रौद्योगिकियों और उद्योगों को नया रूप देगा।

तो आओ, प्राचीन भारतीय ज्ञान प्रणाली और आधुनिक विज्ञान-प्रौद्योगिकी के अनूठे संगम के साथ, हम अपने भारत को विकसित राष्ट्र बनाने हेतु अपना योगदान दें।

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