राहुल गांधी के मनुस्मृति वाले बयान पर जाने-माने विचारक दिलीप मंडल का बड़ा पलटवार Prominent thinker Dilip Mandal hits back strongly at Rahul Gandhi’s statement regarding the Manusmriti.

देश की राजनीति में वैचारिक बहसें अक्सर इतिहास, धर्म और प्राचीन ग्रंथों के इर्द-गिर्द घूमती नजर आती हैं। हाल ही में कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा मनुस्मृति और पुराने भारतीय ग्रंथों को लेकर दिए गए बयानों ने राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में हलचल मचा दी है। इस पूरे घटनाक्रम पर अपनी बेबाक टिप्पणियों के लिए पहचाने जाने वाले जाने-माने लेखक और विचारक दिलीप मंडल ने एक तीखा पलटवार किया है। दिलीप मंडल ने राहुल गांधी के बयान के संदर्भ में प्राचीन व्यवस्थाओं और धार्मिक ग्रंथों पर खुलकर बात की है। उन्होंने अपने तर्क को पुख्ता करने के लिए केवल भारतीय ग्रंथों का ही नहीं, बल्कि पश्चिमी धार्मिक ग्रंथ बाइबिल (Bible) का भी उदाहरण दिया है। उनका यह बयान ऐसे समय पर सामने आया है जब देश में संविधान, सामाजिक न्याय, समानता और प्राचीन व्यवस्थाओं की प्रासंगिकता को लेकर एक बार फिर से जोरदार बहस छिड़ गई है, जिसमें विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक विश्लेषक अपने-अपने तर्क रख रहे हैं।

राहुल गांधी के मनुस्मृति वाले बयान से क्यों गरमाई सियासत

भारतीय राजनीति में जब भी वैचारिक स्वतंत्रता, जातिगत व्यवस्था या समानता की बात आती है, तो प्राचीन ग्रंथों का जिक्र अक्सर छिड़ जाता है। राहुल गांधी ने अपने बयानों में यह रेखांकित करने का प्रयास किया था कि कैसे पुरानी व्यवस्थाएं और ग्रंथ समाज के एक बड़े वर्ग को उनके अधिकारों से वंचित करते रहे हैं। उनके इस दृष्टिकोण को देश के एक बड़े तबके द्वारा सामाजिक सुधार की दिशा में एक जरूरी कदम माना गया, तो वहीं पारंपरिक विचारधारा के लोगों ने इस पर कड़ी आपत्ति भी जताई। इसी बीच, विचारक दिलीप मंडल ने इस पूरी बहस में एक नया आयाम जोड़ते हुए कहा कि आज के आधुनिक, वैज्ञानिक और लोकतांत्रिक युग को चलाने के लिए प्राचीन ग्रंथों या स्मृतियों की पाबंदियों को आधार नहीं बनाया जा सकता है। उनका मानना है कि संविधान ही आज के समय का एकमात्र और सबसे पवित्र ग्रंथ है जो हर नागरिक को बिना किसी भेदभाव के समानता और स्वतंत्रता का अधिकार देता है।

बाइबिल और इतिहास के उदाहरण से दिलीप मंडल की बड़ी बात

अपने इस तीखे पलटवार और विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए दिलीप मंडल ने इतिहास और वैश्विक धर्मग्रंथों का हवाला दिया। उन्होंने बाइबिल और अन्य ऐतिहासिक ग्रंथों का उदाहरण देते हुए यह समझाने का प्रयास किया कि दुनिया के लगभग सभी प्राचीन ग्रंथों की रचना उस दौर की सामाजिक, राजनीतिक और भौगोलिक परिस्थितियों के हिसाब से की गई थी। समय के साथ मानव सभ्यता ने विज्ञान, शिक्षा और लोकतांत्रिक मूल्यों के जरिए जो तरक्की की है, उसे पुरानी व्यवस्थाओं में बांधकर नहीं रखा जा सकता। मंडल ने तर्क दिया कि यदि आज के समाज को आगे बढ़ाना है, तो हमें अतीत की उन रूढ़ियों और पाबंदियों को पीछे छोड़ना होगा जो इंसानों के बीच असमानता या भेदभाव को बढ़ावा देती हैं। उनका यह बयान इस बात पर जोर देता है कि आधुनिक समय के फैसले केवल आधुनिक संविधान, तर्क और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के आधार पर ही लिए जाने चाहिए, न कि किसी प्राचीन परंपरा के भय से।

सामाजिक न्याय, संविधान और आधुनिक भारत का भविष्य

इस पूरी बहस का दायरा सिर्फ एक बयान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत के सामाजिक ताने-बाने और भविष्य की दिशा से जुड़ा हुआ एक गंभीर विषय बन चुका है। एक तरफ जहां राजनीतिक दल अपने वैचारिक एजेंडे के तहत इन मुद्दों को जनता के सामने रखते हैं, वहीं दूसरी तरफ बुद्धिजीवी वर्ग इसे समानता और अधिकारों की लड़ाई के रूप में देखता है। भारत जैसे विविधता से भरे देश में जहां एक ओर परंपराओं का गहरा सम्मान है, वहीं दूसरी ओर आधुनिकता और संवैधानिक मूल्यों को अपनाने की होड़ भी कम नहीं है। राहुल गांधी के बयान और दिलीप मंडल की इस टिप्पणी के बाद अब यह चर्चा फिर से तेज हो गई है कि क्या आज के समाज को चलाने के लिए संविधान ही एकमात्र मार्गदर्शक होना चाहिए या फिर प्राचीन ग्रंथों की सीख भी उतनी ही प्रासंगिक है। बहरहाल, इस वैचारिक मंथन ने देश के राजनीतिक और बौद्धिक हलकों में एक बार फिर से नई बहस को जन्म दे दिया है, जिसका असर आने वाले दिनों में सामाजिक बहसों पर पड़ना तय है।

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