बेटी को बचाने 60 की उम्र में पिता ने दान की थी किडनी, दर-दर भटके पर काम न आई दुआएं; जिंदगी की जंग हार गई लाडली
एक पिता अपनी संतान की खुशी और लंबी उम्र के लिए अपनी जान तक न्योछावर करने को तैयार रहता है। जब बात औलाद की सांसों पर बन आए, तो वह अपनी उम्र, अपनी सेहत और अपनी सारी जमा-पूंजी दांव पर लगा देता है। ऐसी ही एक दिल को झकझोर देने वाली और आंखें नम कर देने वाली घटना सामने आई है, जहां एक पिता ने अपनी बीमार बेटी की जान बचाने के लिए वह सब कुछ किया जो एक इंसान के बस में हो सकता था। 60 साल की ढलती उम्र में अपनी एक किडनी निकालकर बेटी को दान कर देने, अपनी पूरी जिंदगी की गाढ़ी कमाई इलाज में झोंक देने और वर्षों तक एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल के चक्कर काटने के बाद भी किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। तमाम कोशिशों, मेडिकल साइंस के प्रयासों और पिता की अनवरत प्रार्थनाओं के बावजूद आखिर उस लाडली ने दम तोड़ दिया और पिता की गोद हमेशा के लिए सूनी हो गई।
परिवार के मुताबिक, बेटी घर की रौनक थी और उसकी मुस्कान से पूरा घर चहकता था। लेकिन कुछ साल पहले अचानक उसकी तबीयत बिगड़ने लगी। शुरुआत में सामान्य कमजोरी और पैरों में सूजन की शिकायत हुई, जिसे सामान्य थकान समझकर स्थानीय डॉक्टरों को दिखाया गया। जब नियमित दवाओं से कोई राहत नहीं मिली और स्थिति गंभीर होने लगी, तो डॉक्टरों ने उच्च स्तरीय जांच कराने की सलाह दी। जब पैथोलॉजी और रीनल फंक्शन टेस्ट की रिपोर्ट सामने आई, तो पूरे परिवार के पैरों तले से जमीन खिसक गई। डॉक्टरों ने पुष्टि की कि युवती की दोनों किडनियां गंभीर रूप से डैमेज हो चुकी हैं और वह क्रॉनिक किडनी डिजीज (CKD) के अंतिम चरण में पहुंच चुकी है। डॉक्टरों ने साफ कह दिया था कि नियमित डायलिसिस केवल कुछ समय का सहारा है, अगर मरीज को लंबी जिंदगी देनी है तो तुरंत किडनी ट्रांसप्लांट (गुर्दा प्रत्यारोपण) ही एकमात्र रास्ता बचा है।
अस्पतालों में ऑर्गन डोनर की लंबी वेटिंग लिस्ट और कानूनी प्रक्रियाओं के कारण उपयुक्त डोनर मिलना लगभग नामुमकिन सा हो रहा था। हर गुजरते दिन के साथ बेटी की हालत नाजुक होती जा रही थी, डायलिसिस के भारी दर्द से उसका शरीर कमजोर पड़ता जा रहा था। बेटी का यह दर्द 60 वर्षीय पिता से देखा नहीं गया। उन्होंने डॉक्टरों से साफ कह दिया कि वे अपनी किडनी अपनी बेटी को देंगे।
चिकित्सकीय नियमों के अनुसार 60 वर्ष की उम्र में अंगदान करना डोनर के अपने स्वास्थ्य के लिए भी बड़े जोखिम से भरा होता है। डॉक्टरों ने कई मेडिकल टेस्ट किए और बुजुर्ग पिता की सेहत से जुड़े खतरों से आगाह भी किया, लेकिन पिता के सिर पर केवल एक ही धुन सवार थी—किसी भी तरह अपनी लाडली की जान बचाना। सभी जरूरी टेस्ट मैच होने और कानूनी अनुमतियां मिलने के बाद जटिल सर्जरी की गई। पिता ने हंसते-हंसते अपनी एक किडनी बेटी के नाम कर दी। सर्जरी के बाद जब बेटी की आंखें खुलीं, तो ऐसा लगा मानो पिता की कुर्बानी रंग लाई है और उसने मौत को मात दे दी है।
किडनी ट्रांसप्लांट के बाद जिंदगी की राह उतनी आसान नहीं रही जितनी परिवार ने उम्मीद की थी। ट्रांसप्लांट मरीजों को ताउम्र इम्यूनोसप्रेसेंट (रोग प्रतिरोधक क्षमता कम करने वाली) दवाइयों पर निर्भर रहना पड़ता है ताकि शरीर नए अंग को रिजेक्ट न करे। इन महंगी दवाओं, बार-बार होने वाले इन्फेक्शन और पोस्ट-ऑपरेटिव कॉम्प्लिकेशंस के चलते पिता का संघर्ष और बढ़ गया। पिता अपनी गिरती सेहत की परवाह किए बिना अपनी एक ही किडनी के सहारे बेटी को लेकर शहर-दर-शहर बड़े सुपर स्पेशियलिटी अस्पतालों के चक्कर काटते रहे।
इलाज का खर्च इतना बढ़ गया कि घर की जमा-पूंजी, जमीन और जेवर सब धीरे-धीरे बिक गए। पिता ने रिश्तेदारों, परिचितों और कर्जदाताओं के आगे हाथ फैलाए ताकि बेटी की दवाइयों में एक दिन का भी नागा न हो। वे खुद लाठी के सहारे चलते रहे, लेकिन बेटी को कभी यह महसूस नहीं होने दिया कि वे थक चुके हैं। वर्षों तक अस्पताल के गलियारों में रातें गुजारना, आईसीयू के बाहर डॉक्टरों के चेहरे के भाव पढ़ना ही उस पिता की दिनचर्या बन चुका था।
बीते कुछ हफ्तों से बेटी की तबीयत अचानक दोबारा बिगड़ने लगी। शरीर ने नई किडनी को रिजेक्ट करना शुरू कर दिया था और गंभीर संक्रमण फेफड़ों तक फैल गया था। डॉक्टरों की विशेषज्ञ टीम ने उसे वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखकर बचाने की हर मुमकिन कोशिश की, लेकिन मल्टी-ऑर्गन फेलियर के चलते आखिरकार उसकी सांसों की डोर टूट गई।
अस्पताल के बाहर जब डॉक्टरों ने सिर झुकाकर यह दुखद खबर दी, तो 60 साल का वह मजबूत पिता जो वर्षों से चट्टान की तरह डटा हुआ था, बच्चों की तरह बिलख पड़ा। जिस बेटी की जिंदगी के लिए उन्होंने अपना शरीर, अपनी दौलत और अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था, वह उन्हें अकेला छोड़कर अनंत यात्रा पर निकल चुकी थी। जिसने भी इस बेबस पिता के संघर्ष और इस दर्दनाक अंत के बारे में सुना, उसकी आंखें भर आईं। यह दास्तान इस बात की गवाह बन गई कि एक पिता अपनी संतान के लिए किस हद तक जा सकता है, भले ही नियति के क्रूर फैसले के आगे इंसान के सारे प्रयास कभी-कभी बेबस साबित हो जाते हैं।
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