देश में सूखे का साया! मानसून की विदाई के साथ 14 राज्यों में बारिश की भारी कमी, 10% डेफिसिट पर खत्म हो सकता है सीजन
देश के अन्नदाताओं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए मौसम विभाग से एक बड़ी और चिंताजनक खबर सामने आई है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार दक्षिण-पश्चिम मानसून (Southwest Monsoon) की देश से आधिकारिक वापसी की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। पश्चिमी राजस्थान के फलौदी, रामगढ़ और खाजूवाला से मानसून की वापसी रेखा गुजर रही है और आने वाले दिनों में यह पंजाब, हरियाणा और गुजरात के कच्छ क्षेत्र से भी विदा हो जाएगा।
हालांकि, इस बार मानसून का जाना राहत भरा नहीं, बल्कि गहरी चिंता का सबब बन रहा है। देश के 14 बड़े राज्यों में सामान्य से 20 प्रतिशत से भी अधिक कम वर्षा दर्ज की गई है। मौसम विज्ञानियों का अनुमान है कि 30 सितंबर को जब 4 महीने का यह मानसूनी सीजन समाप्त होगा, तो समूचे भारत में बारिश का कुल घाटा (Overall Deficit) 10% से अधिक दर्ज हो सकता है—मौसम विज्ञान की परिभाषा में 10% से अधिक की अखिल भारतीय कमी को सूखे (Drought) की स्थिति के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।
आईएमडी के संचयी वर्षा आंकड़ों के अनुसार देश भर में 1 जून से लेकर अब तक कुल बारिश में लगभग 14% से 15% की कमी बनी हुई है। सबसे खराब स्थिति देश के 14 राज्यों में है जहां वर्षा की कमी 20 फीसदी के खतरे के निशान को पार कर चुकी है। इनमें उत्तर भारत के पंजाब (लगभग 40% की कमी), हरियाणा (23% की कमी) और राजस्थान (25% की कमी) शामिल हैं।
पूर्वी भारत में बिहार राज्य सबसे गंभीर संकट से गुजर रहा है, जहां सामान्य से 35% कम बारिश हुई है। वहीं पूर्वोत्तर के मेघालय (59% डेफिसिट) और अरुणाचल प्रदेश (42% डेफिसिट) में नदियां और जलस्रोत सूखने की कगार पर हैं। इसके अलावा प्रायद्वीपीय भारत के सभी पांचों राज्य—आंध्र प्रदेश (43% की भारी कमी), कर्नाटक (29%), केरल (27%), तमिलनाडु (26%) और तेलंगाना (20%)—कमजोर मानसून की दोहरी मार झेल रहे हैं। देश भर के 218 से अधिक कृषि जिलों में भूजल स्तर में भारी गिरावट और सूखे जैसी गंभीर परिस्थितियां बन गई हैं।
इस वर्ष मानसूनी हवाओं के असमान और कमजोर रहने का सबसे मुख्य कारण प्रशांत महासागर में सक्रिय अल-नीनो (El Niño) मौसमी परिघटना को माना जा रहा है। अल-नीनो के प्रभाव से भूमध्यरेखीय प्रशांत क्षेत्र की समुद्री सतह असामान्य रूप से गर्म हो जाती है, जिससे भारत की ओर नमी खींचने वाली मानसूनी ट्रफ लाइन कमजोर पड़ जाती है।
जून के महीने में देश में 40% तक की भारी कमी देखी गई थी, हालांकि जुलाई में आए पश्चिमी विक्षोभों के चलते बारिश में सुधार हुआ था। लेकिन अगस्त और सितंबर के महीनों में लंबे ‘मॉनसून ब्रेक’ (Monsoon Break) के कारण बादलों की आवाजाही ठप पड़ गई। भले ही बंगाल की खाड़ी में हाल ही में बने निम्न दबाव और डिप्रेशन के चलते पूर्वी तटीय राज्यों (ओडिशा, बंगाल, आंध्र प्रदेश) में अंतिम समय में कुछ बौछारें देखने को मिल रही हैं, लेकिन यह बारिश पूरे चार महीने के इस संचयी घाटे की भरपाई करने के लिए नाकाफी साबित होगी।
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ, कानपुर, प्रयागराज, वाराणसी, गोरखपुर और बुंदेलखंड के जनपदों से लेकर सीमावर्ती बिहार (पटना, गया, मुजफ्फरपुर) तक किसानों की नजरें आसमान की ओर टिकी हुई हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के वे जिले जो पूरी तरह वर्षा आधारित खेती (Rainfed Farming) पर निर्भर हैं, वहां सिंचाई की लागत बेतहाशा बढ़ चुकी है।
किसानों को ट्यूबवेल और डीजल पंपों के जरिए पानी देने पर भारी खर्च करना पड़ रहा है, जिससे उनकी उत्पादन लागत दोगुनी हो गई है। पंजाब और हरियाणा जैसे सिंचित राज्यों में भी भूजल स्तर (Water Table) पाताल में पहुंच रहा है और बिजली की खपत रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। जिन जिलों में नहरों और बांधों में पानी का भंडारण सामान्य क्षमता से 30 से 40 प्रतिशत कम दर्ज किया गया है, वहां आने वाले महीनों में पीने के पानी और सिंचाई के लिए कड़ा जल संकट खड़ा हो सकता है।
मानसून की इस 10% से 15% की कमी का सीधा प्रभाव देश की खाद्य सुरक्षा और फसलों की पैदावार पर पड़ना तय है:
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धान (Paddy) की पैदावार पर मार: पानी की सबसे अधिक खपत करने वाले धान के रकबे में पिछले साल की तुलना में करीब 4 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। जिन इलाकों में फूल आने और दाना भरने के नाजुक समय पर बारिश नहीं हुई, वहां उपज (Yield) में 15 से 20 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है।
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दालें और तिलहन: कर्नाटक, महाराष्ट्र और राजस्थान में तुअर (अरहर), उड़द, मूंग और सोयाबीन की फसलों को समय पर नमी न मिलने से उत्पादन प्रभावित होने की आशंका है, जिससे आने वाले दिनों में दालों की खुदरा कीमतों में तेजी आ सकती है।
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रबी बुवाई की तैयारी (Soil Moisture Deficit): सबसे बड़ी चिंता अक्टूबर-नवंबर से शुरू होने वाले रबी सीजन (गेहूं, सरसों, चना) को लेकर है। यदि विदाई के समय मिट्टी में अवशिष्ट नमी (Soil Moisture) पर्याप्त नहीं रही और जलाशयों में पानी की कमी रही, तो किसानों के लिए गेहूं और सरसों की समय पर बुवाई करना बेहद चुनौतीपूर्ण हो जाएगा।
कमजोर मानसून के शुरुआती संकेतों को देखते हुए केंद्रीय कृषि मंत्रालय और राज्य सरकारों ने देश के 315 से अधिक संवेदनशील जिलों के लिए कृषि आकस्मिक योजनाएं (Contingency Plans) सक्रिय की हैं। विशेष रूप से उन 111 जिलों पर नजर रखी जा रही है जहां सिंचाई का कवरेज 25% से भी कम है।
कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को यह व्यावहारिक सलाह दी है:
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जहां धान की फसल सूखने की कगार पर है, वहां ड्रिप या स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई पद्धतियों का उपयोग करें।
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आने वाले रबी सीजन के लिए लंबी अवधि वाली किस्मों के बजाय कम समय और कम पानी में पकने वाली दलहनी और तिलहनी फसलों (जैसे चना, मसूर और राई/सरसों) की बुवाई को प्राथमिकता दें।
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खेतों में जैविक मल्चिंग (Mulching) का प्रयोग करें ताकि जमीन में मौजूद नमी लंबे समय तक सुरक्षित रह सके।
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