दिल्ली में विरोध प्रदर्शन और पुलिसिया एक्शन पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, अलग-अलग तारीखों पर होगी सभी मामलों की सुनवाई

देश की राजधानी दिल्ली में हाल ही में हुए विरोध प्रदर्शनों, व्यापक पुलिस कार्रवाई, आवाजाही पर लगी पाबंदियों और पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार से जुड़े विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद कड़ा और सख्त रुख अख्तियार किया है। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की विशेष पीठ ने राजधानी के अलग-अलग हिस्सों में दर्जनों याचिकाओं के अंबार को देखते हुए एक ऐतिहासिक और विस्तृत व्यवस्था दी है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि प्रदर्शन के अधिकार, पुलिस बल के कथित मनमाने इस्तेमाल, पत्रकारों की सुरक्षा और चुनाव आयोग से जुड़े राजनीतिक मुद्दों को एक ही तराजू में नहीं तौला जा सकता, इसलिए अदालत इन सभी संबंधित मामलों को अलग-अलग श्रेणियों में बांटकर विभिन्न तारीखों पर गहन सुनवाई करेगी। लखनऊ से लेकर दिल्ली के विधिक और प्रशासनिक गलियारों में सुप्रीम कोर्ट के इस रुख को नागरिक अधिकारों और पुलिसिया जवाबदेही के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दिल्ली प्रदर्शनों और निषेधाज्ञा से जुड़ी 45 से अधिक याचिकाएं और अर्जियां दाखिल की गई थीं। सुनवाई के दौरान पीठ ने माना कि हर मामले की प्रकृति, संवैधानिक पहलू और कानूनी राहत अलग-अलग हैं, इसलिए सभी याचिकाओं को क्लब करके एक साथ सुनना व्यावहारिक नहीं होगा। अदालत ने याचिकाकर्ताओं और केंद्र सरकार दोनों पक्षों की ओर से नोडल वकील नियुक्त किए हैं और उन्हें 28 अक्टूबर तक सभी याचिकाओं को उनकी विषय-वस्तु के आधार पर अलग-अलग समूहों में वर्गीकृत करने का निर्देश दिया है। इसके तहत दिल्ली में हुए प्रदर्शनों, पुलिस के बल प्रयोग, हिरासत में लिए गए प्रदर्शनकारियों और जंतर-मंतर पर पाबंदियों से जुड़े मुख्य मामलों की सुनवाई 3 नवंबर को निर्धारित की गई है। वहीं, चुनाव आयोग के मतदाता सूची पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े राजनीतिक मामलों की सुनवाई 27 अक्टूबर को होगी, जबकि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 और धारा 172 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर 19 नवंबर को विस्तृत सुनवाई की जाएगी।

सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने सभी जांच एजेंसियों और दिल्ली पुलिस को कड़ा आदेश दिया कि वे प्रदर्शनों के दौरान का पूरा कच्चा चिट्ठा सुरक्षित रखें। कोर्ट ने निर्देश दिया कि प्रदर्शन स्थलों, मेट्रो स्टेशनों, बैरिकेडिंग पॉइंट्स और पुलिस थानों के आसपास की सभी सीसीटीवी फुटेज और डिजिटल रिकॉर्ड्स को पूरी तरह संरक्षित किया जाए। किसी भी परिस्थिति में इन डिजिटल साक्ष्यों के साथ कोई छेड़छाड़ या उन्हें डिलीट नहीं किया जाना चाहिए। इसके साथ ही अदालत ने निजी पक्षों, पत्रकारों और प्रदर्शनकारियों को भी यह छूट दी है कि यदि उनके पास पुलिस कार्रवाई, लाठीचार्ज या अनुचित हिरासत से संबंधित कोई मोबाइल वीडियो या डिजिटल साक्ष्य मौजूद हैं, तो वे उन्हें हलफनामे के साथ सीधे अदालत के रिकॉर्ड में जमा कर सकते हैं। कोर्ट ने केंद्र सरकार से यह भी कहा है कि दिल्ली में बीएनएसएस की धारा 163 के तहत जारी किए गए सभी निषेधात्मक आदेशों की प्रतियां भी रिकॉर्ड पर पेश की जाएं।

इस पूरे प्रकरण में कवरेज कर रहे पत्रकारों के साथ पुलिसिया बदसलूकी और दर्ज मुकदमों का मुद्दा भी बेहद जोर-शोर से उठा। अदालत ने एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी द्वारा महिला पत्रकार के खिलाफ दर्ज कराई गई एससी/एसटी एक्ट की एफआईआर के मामले में कड़ा संज्ञान लेते हुए बड़ा अंतरिम संरक्षण प्रदान किया है। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि उक्त महिला पत्रकार के खिलाफ फिलहाल कोई भी दंडात्मक या सख्त कार्रवाई (No Coercive Action) नहीं की जाएगी। पीठ ने कहा कि लोकतंत्र में मीडिया की स्वतंत्रता और रिपोर्टिंग के अधिकार पर किसी भी तरह का अनुचित प्रशासनिक पहरा स्वीकार नहीं किया जा सकता। इस विशिष्ट मामले पर अदालत ने केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी करते हुए दो सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने को कहा है और इसकी अगली सुनवाई 5 नवंबर को तय की है।

दिल्ली पुलिस द्वारा जंतर-मंतर को मुख्य प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाकर रामलीला मैदान, बुराड़ी और पूर्वी दिल्ली के सीबीडी ग्राउंड जैसे वैकल्पिक स्थानों को तय किए जाने के फैसले को भी अदालत में जोरदार चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि शहर के दूरदराज और कचरा भराव (लैंडफिल) क्षेत्रों के नजदीक प्रदर्शन स्थल तय करना नागरिकों के शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के मौलिक अधिकार को सीमित करने जैसा है। शीर्ष अदालत ने इस पर भी पुलिस और प्रशासन से स्थिति स्पष्ट करने को कहा है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि राजधानी में कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस की जिम्मेदारी जरूर है, लेकिन इसके नाम पर शहर को छावनी में तब्दील करना, सार्वजनिक परिवहन रोकना और अदालतों तक वकीलों व आम नागरिकों की पहुंच को बाधित करना किसी भी सूरत में न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता।

 

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