News India Live, Digital Desk: गुजरात की सियासत में एक बार फिर ‘आम आदमी पार्टी’ (AAP) ने हलचल पैदा कर दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृह राज्य गुजरात में, जिसे भाजपा का अभेद्य किला माना जाता है, वहां की आदिवासी बेल्ट से चौंकाने वाले रुझान सामने आ रहे हैं। ताज़ा राजनीतिक विश्लेषणों और स्थानीय फीडबैक के अनुसार, अरविंद केजरीवाल का ‘शिक्षा और स्वास्थ्य’ मॉडल गुजरात के आदिवासी क्षेत्रों में अपनी पैठ बनाने में सफल रहा है। इसे भाजपा के खिलाफ ‘आप’ का एक बड़ा ‘गेम प्लान’ माना जा रहा है, जिस पर जनता की मुहर लगती दिख रही है।
आदिवासी बेल्ट में क्यों चला ‘केजरीवाल मॉडल’?
गुजरात के पूर्वी हिस्से में स्थित आदिवासी बहुल जिलों (जैसे भरूच, वलसाड, नर्मदा और तापी) में बुनियादी सुविधाओं की मांग हमेशा से प्रमुख रही है। ‘आप’ ने इन्हीं बुनियादी जरूरतों को अपनी राजनीति का केंद्र बनाया:
फ्री बिजली और पानी का वादा: पंजाब और दिल्ली की तर्ज पर दिए गए इन वादों ने गरीब और मध्यम वर्ग के आदिवासियों को आकर्षित किया है।
शिक्षा और मोहल्ला क्लिनिक: आदिवासी क्षेत्रों में सरकारी स्कूलों की हालत और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी को ‘आप’ ने ढाल बनाया और अपने मॉडल को ‘भरोसेमंद विकल्प’ के रूप में पेश किया।
स्थानीय मुद्दे: जल-जंगल-जमीन के अधिकार और ‘पेसा कानून’ (PESA Act) को सख्ती से लागू करने के वादे ने आदिवासियों के बीच केजरीवाल की छवि को एक ‘मददगार’ नेता के रूप में स्थापित किया है।
भाजपा के ‘गढ़’ में सेंधमारी की तैयारी
दशकों से गुजरात के आदिवासी क्षेत्रों में कांग्रेस और भाजपा के बीच मुकाबला रहा है। लेकिन 2022 के विधानसभा चुनावों के बाद से ‘आप’ ने यहां अपनी पकड़ मजबूत की है।
कांग्रेस की कमजोरी का फायदा: कांग्रेस के पारंपरिक आदिवासी वोट बैंक में बिखराव का सीधा लाभ ‘आप’ को मिलता दिख रहा है।
भाजपा की चिंता: भाजपा जो ‘आदिवासी गौरव’ और ‘विकास’ की बात करती है, उसे ‘आप’ के इस जमीनी मॉडल से कड़ी चुनौती मिल रही है। विश्लेषकों का मानना है कि ‘आप’ ने यहां भाजपा को विकास के पुराने दावों के बजाय ‘सुविधाओं’ के नए दावों पर घेर लिया है।
जनता की ‘मुहर’ और आगामी संकेत
स्थानीय स्तर पर हुए हालिया छोटे चुनावों और जनसभाओं में उमड़ रही भीड़ इस बात का संकेत है कि आदिवासी समुदाय अब एक तीसरे विकल्प को आजमाने के लिए तैयार है। केजरीवाल का ‘दिल्ली मॉडल’ जिसे पहले शहरी क्षेत्रों तक सीमित माना जाता था, वह अब गुजरात के सुदूर गांवों और पहाड़ियों तक पहुँच चुका है।
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