कंबोडिया से चल रहा था भारत में डिजिटल अरेस्ट का खेल, 5300 भारतीय सिम कार्डों से सैकड़ों करोड़ की ठगी
देश में पैर पसार चुके साइबर अपराधियों और अंतरराष्ट्रीय ठग गिरोहों के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने अब तक की सबसे बड़ी और निर्णायक कार्रवाई शुरू कर दी है। कंबोडिया में बैठकर भारत के मासूम और सीधे-साधे लोगों को चूना लगाने वाले एक खतरनाक मलेशियाई गिरोह का भंडाफोड़ हुआ है, जो करीब 5,300 भारतीय सिम कार्डों के जरिए पूरे देश में सैकड़ों करोड़ रुपये की ऑनलाइन धोखाधड़ी और 'डिजिटल अरेस्ट' जैसी वारदातों को अंजाम दे रहा था। इस बेहद संवेदनशील और बड़े अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क का खुलासा होने के बाद ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम (PMLA) के तहत केस दर्ज कर अपराधियों पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया है, जिससे देश के बैंकिंग और टेलीकॉम सेक्टर में हड़कंप मच गया है।
राजस्थान से लेकर पंजाब तक ईडी की ताबड़तोड़ छापेमारी, 30 गुप्त बैंक खातों का हुआ सनसनीखेज खुलासा
इस अंतरराष्ट्रीय साइबर सिंडिकेट की जड़ों को उखाड़ने के लिए ईडी की अलग-अलग टीमों ने बीते 5 जून को एक साथ देश के कई राज्यों में ताबड़तोड़ छापेमारी की थी। जांच एजेंसी ने पंजाब के लुधियाना के साथ-साथ राजस्थान के किशनगढ़, नागौर और जोधपुर में कुल सात संदिग्ध ठिकानों पर कड़ाई से तलाशी ली। इस व्यापक सर्च ऑपरेशन के दौरान ईडी के हाथ कई बेहद चौंकाने वाले सुराग लगे, जिनके आधार पर देश के भीतर ही सक्रिय 30 घरेलू बैंक खातों की पहचान की गई है। ये सभी बैंक खाते इस महा-धोखाधड़ी नेटवर्क का मुख्य हिस्सा थे और कंबोडिया से ठगे गए करोड़ों रुपये को भारत में ठिकाने लगाने (मनी लॉन्ड्रिंग) के लिए इस्तेमाल किए जा रहे थे।
जोधपुर पुलिस की एफआईआर से खुला राज, भोले-भाले लोगों के नाम पर सिम एक्टिवेट कर मलेशियाई नागरिक को सौंपे
ईडी द्वारा शुरू की गई यह बड़ी जांच असल में जोधपुर पुलिस द्वारा दर्ज की गई एक एफआईआर (प्राथमिकी) से जुड़ी हुई है। पुलिस जांच में यह सामने आया था कि कुछ पीओएस (प्वाइंट ऑफ सेल्स) सिम विक्रेताओं ने लालच में आकर धोखाधड़ी से भारतीय सिम कार्ड्स को एक्टिवेट किया और उन्हें भारत से बाहर बैठे एक मलेशियाई नागरिक के हवाले कर दिया। कंबोडिया में सक्रिय इन ठगी गिरोहों के निशाने पर सबसे ज्यादा भारतीय लोग ही थे, जिन्हें डरा-धमकाकर या फर्जी निवेश के बहाने 'डिजिटल अरेस्ट' किया जाता था और उनसे मोटी रकम वसूली जाती थी।
2.3 लाख संदिग्ध नंबरों की कुंडली खंगालने पर सामने आया कंबोडिया कनेक्शन, व्हाट्सएप कॉल से होती थी ठगी
जांच के दौरान ईडी के साइबर एक्सपर्ट्स ने जब बेहद बारीकी से करीब 2.3 लाख संदिग्ध मोबाइल नंबरों (सिम कार्ड) के डेटा का गहराई से विश्लेषण किया, तो उनके होश उड़ गए। इस महा-विश्लेषण में यह साफ तौर पर पता चला कि इनमें से लगभग 36 हजार भारतीय सिम कार्ड सीधे तौर पर कंबोडिया की धरती पर पूरी तरह एक्टिव थे। सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात यह है कि इनमें से लगभग 5,300 सिम कार्ड ऐसे थे, जिनका इस्तेमाल करके अपराधी कंबोडिया से भारत के लोगों को व्हाट्सएप कॉल (WhatsApp Call) करते थे और खुद को पुलिस या सरकारी अधिकारी बताकर पूरे भारत में सैकड़ों करोड़ रुपये की साइबर धोखाधड़ी को धड़ल्ले से अंजाम दे रहे थे।
जियो, एयरटेल और वोडाफोन के रिटेलर्स ने मिलकर रचा चक्रव्यूह, फर्जीवाड़ा करने वाले चेहरों के नाम आए सामने
ईडी की छापेमारी और पूछताछ के दौरान इस पूरे काले कारोबार के मास्टरमाइंड्स के नामों का भी खुलासा हो गया है। जांच में सामने आया कि राहुल कुमार झा, मोहम्मद शरीफ और संदीप भट्ट नाम के मुख्य आरोपियों ने प्रकाश भील, रामअवतार राठी, हरीश मालाकार और हेमंत पनवार नामक सिम विक्रेताओं के साथ मिलकर इस खतरनाक साजिश को रचा था। इन सिम विक्रेताओं के पास एयरटेल, जियो और वोडाफोन इंडिया जैसे देश के बड़े टेलीकॉम ऑपरेटरों की आधिकारिक पीओएस आईडी (POS ID) थी। ये आरोपी सिम कार्ड पोर्ट कराने या नया सिम जारी करने के बहाने कम पढ़े-लिखे, गरीब और सीधे-साधे ग्रामीणों को अपना निशाना बनाते थे।
बायोमेट्रिक का गलत इस्तेमाल और भारी कमीशन का लालच, ऐसे चलता था पूरा खेल
इन शातिर ठगों का काम करने का तरीका बेहद चौंकाने वाला था। जब कोई सीधा-साधा ग्राहक इनके पास अपनी सिम पोर्ट कराने या नया सिम लेने आता था, तो ये आरोपी उसका फिंगरप्रिंट (बायोमेट्रिक) ले लेते थे। सिम एक्टिवेट करने के बहाने वे उसी ग्राहक के दस्तावेजों और बायोमेट्रिक का गलत इस्तेमाल करके चुपके से एक या दो अतिरिक्त सिम कार्ड भी एक्टिवेट कर लेते थे। ग्राहकों को इस बात की कानों-कान खबर नहीं होती थी कि उनके नाम पर कोई और सिम भी चालू हो चुका है। बाद में इन अवैध रूप से चालू किए गए सिम कार्डों को राहुल कुमार झा और उसके सहयोगियों के जरिए मोटे कमीशन और पैसों के बदले में उस मलेशियाई नागरिक को कंबोडिया भेज दिया जाता था, जहां से भारत के खिलाफ साइबर युद्ध और ठगी का यह खेल खेला जा रहा था।
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