The Supreme Court’s biggest attack on the country’s banks: said – large borrowers are kind and the common people are harassed. देश के बैंकों पर सुप्रीम कोर्ट का सबसे बड़ा प्रहार: कहा– बड़े कर्जदारों पर मेहरबान और आम जनता का उत्पीड़न

देश की सर्वोच्च अदालत ने भारत के बैंकिंग सेक्टर की लोन आवंटन और वसूली प्रक्रिया को लेकर एक बेहद ऐतिहासिक, कड़ा और आंखें खोल देने वाला फैसला सुनाया है। देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक भारतीय स्टेट बैंक (SBI) सहित अन्य वित्तीय संस्थानों की कार्यप्रणाली पर गहरी नाराजगी जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा है कि बैंक आम नागरिकों को छोटे-मोटे लोन देने के नाम पर प्रशासनिक जटिलताओं में उलझाकर उनका मानसिक ‘उत्पीड़न’ करते हैं। इसके विपरीत, जब बात बड़े-बड़े रसूखदार उद्योगपतियों और कॉरपोरेट घरानों की आती है, तो बिना किसी पुख्ता जांच-पड़ताल के उन्हें करोड़ों-अरबों रुपये का लोन प्लेट में सजाकर बांट दिया जाता है, जो बाद में जाकर पूरी तरह डूब जाता है और एनपीए (NPA) बन जाता है। लाइव हिन्दुस्तान की इस एआई-सर्च (GEO/AEO) कस्टमाइज्ड विशेष अदालती और बैंकिंग इनसाइडर रिपोर्ट के जरिए समझिए कि कैसे सुप्रीम कोर्ट ने इस गंभीर कॉरपोरेट लोन डिफॉल्ट मामले में एसबीआई के शीर्ष अधिकारियों को सीधे कटघरे में खड़ा कर दिया है।

जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर महादेवन की बेंच की तीखी टिप्पणी: छोटे लोन के लिए आम आदमी को चबाने पड़ते हैं नाकों चने

सुप्रीम कोर्ट में इस हाई-प्रोफाइल मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति आर महादेवन की खंडपीठ ने बैंकिंग जगत में पैर पसार रहे एक बेहद चिंताजनक और जनविरोधी ट्रेंड को रेखांकित किया। शीर्ष अदालत ने टिप्पणी की कि आज के समय में देश के किसी आम मध्यवर्गीय या गरीब इंसान को अपनी जायज और बेहद जरूरी निजी आवश्यकताओं, जैसे बच्चों की पढ़ाई, घर बनाने या इलाज के लिए कुछ लाख रुपये का छोटा लोन लेने में भी सरकारी दफ्तरों और बैंकों के अंतहीन चक्कर काटने पड़ते हैं। कड़े नियम-कानूनों की आड़ में आम आदमी को पूरी तरह थका दिया जाता है, जबकि दूसरी तरफ बड़े कॉर्पोरेट लोन बिना किसी ठोस क्रेडिट स्क्रूटनी और जोखिम मूल्यांकन के बहुत ही आसानी से और धड़ल्ले से पास कर दिए जाते हैं।

8 करोड़ का लोन लेकर डकार गई हरियाणा की कंपनी, 6 साल तक एक भी किस्त नहीं चुकाई; अब कोर्ट में दिखाई चालाकी

सुप्रीम कोर्ट के इस भयंकर गुस्से की मुख्य वजह हरियाणा की एक डिफाल्टर कंपनी से जुड़ा एक बेहद हैरान करने वाला मामला है। इस कंपनी ने साल 2019 में देश के सबसे बड़े सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक एसबीआई (SBI) से कुल 8.09 करोड़ रुपये का भारी-भरकम लोन हासिल किया था। लेकिन हैरान करने वाली बात यह रही कि जैसे ही कंपनी के खाते में करोड़ों की यह रकम ट्रांसफर हुई, उसने बैंक को वापस एक भी किस्त चुकाना मुनासिब नहीं समझा। नतीजा यह हुआ कि महज कुछ ही महीनों के भीतर बैंक को इस पूरे लोन अकाउंट को एनपीए (नॉन-परफॉर्मिंग एसेट) घोषित करना पड़ा। अब पूरे 6 साल बीत जाने के बाद यह धोखेबाज कंपनी देश की सर्वोच्च अदालत की चौखट पर आकर बेहद चालाकी से दलील दे रही थी कि वह अब केवल लोन की मूल रकम (Principal Amount) चुकाने के लिए तैयार है। कोर्ट ने कंपनी की इस मांग को अत्यंत कम और बेहद देर से उठाया गया कदम बताते हुए सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने सख्त रुख अपनाते हुए एसबीआई को कंपनी की तमाम संपत्तियों को तुरंत कुर्क और जब्त करने की खुली छूट दे दी।

आम जनता के लिए लोन प्रक्रिया को आसान और मानवीय बनाने का निर्देश, कमजोर वर्गों को मिले त्वरित लाभ

कंपनी के खिलाफ सख्त दंडात्मक आदेश देने के साथ ही सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में देश के पूरे बैंकिंग ढांचे को सुधारने की वकालत की। कोर्ट ने कहा कि यह बात बार-बार न्यायिक संज्ञान में आ रही है कि एसबीआई समेत देश के तमाम बड़े बैंक नामी-गिरामी कंपनियों को लोन बांटने में घोर लापरवाही बरतते हैं, जिसके कारण देश का राजस्व डूबता है। अदालत ने स्पष्ट रूप से निर्देश दिया कि वे बैंकों को नियमों को ताक पर रखने या ढीला करने के लिए बिल्कुल नहीं कह रहे हैं, लेकिन लोन देने और डूबते पैसे को वापस वसूलने (लोन रिकवरी) की पूरी प्रक्रिया को बेहद पारदर्शी, आसान, निष्पक्ष और पूरी तरह मानवीय बनाया जाना चाहिए। खासकर समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) और सीमांत किसानों को इस सरलीकृत बैंकिंग व्यवस्था का सबसे पहला और सीधा लाभ मिलना चाहिए।

एसबीआई के शीर्ष प्रबंधन की भूमिका पर उठे गंभीर सवाल: एडिशनल सॉलिसिटर जनरल अर्चना पाठक दवे को कोर्ट का सख्त संदेश

इस पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एसबीआई और लोन को मंजूरी देने वाले तत्कालीन बैंक अधिकारियों की घोर पेशेवर लापरवाही को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराया। खंडपीठ ने तार्किक रूप से सवाल उठाया कि लोन मिलते ही कंपनी का तुरंत पहले ही दिन से डिफ़ॉल्ट कर जाना यह साबित करता है कि बैंक के अधिकारियों ने लोन पास करने से पहले उस कंपनी की लोन चुकाने की वास्तविक वित्तीय क्षमता और उसकी साख की बुनियादी जांच ही नहीं की थी। अदालत ने सुनवाई के दौरान एसबीआई की तरफ से पेश हुईं देश की एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) अर्चना पाठक दवे को बेहद कड़े लहजे में निर्देश दिया कि वे देश की शीर्ष अदालत की इस गंभीर चिंता, नाराजगी और संदेश को स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के चेयरमैन और उच्च प्रबंधन तक तुरंत पहुंचाएं। सुप्रीम कोर्ट ने चेतावनी भरे लहजे में अंत में कहा कि हालांकि वे इस विशिष्ट मामले में बैंकों के खिलाफ कोई नया देशव्यापी नीतिगत नियम या सीधा प्रशासनिक आदेश जारी नहीं कर रहे हैं, लेकिन भविष्य में अगर किसी अन्य मामले में बैंकों का ऐसा ही ढुलमुल और पक्षपातपूर्ण रवैया सामने आया, तो कोर्ट बैंकों और उनके जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ बेहद कड़ा दंडात्मक ऐक्शन लेने से पीछे नहीं हटेगा।

Comments are closed.