पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की सचिव ने ‘भारत में अनुकूलन और अनुकूलन तैयारी पर दीर्घकालिक रणनीति’ विषय पर इंडिया पवेलियन में आयोजित सत्र में भाग लिया

विकास कार्यों में अनुकूलन सबसे आगे होना चाहिए: सचिव, एमओईएफसीसी

पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की सचिव श्रीमती लीना नंदन ने आज कॉप 27 में “द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (टेरी) द्वारा इंडिया पवेलियन में आयोजित सत्र में ‘भारत में अनुकूलन और अनुकूलन तैयारी पर दीर्घकालिक रणनीति’ विषय पर अपने विचार साझा किये।

अनुकूलन के लिए वित्त की अनिवार्यता को रेखांकित करते हुए, सचिव सुश्री लीना नंदन ने कहा कि पारदर्शिता और निवेशकों का विश्वास बढ़ाने के लिए एक वैश्विक आधार विकसित करना अनुकूलन तैयारी को बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण उपाय है।

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सुश्री नंदन ने कहा कि विकास कार्यों में अनुकूलन सबसे आगे होना चाहिए। उन्होंने कहा, “संस्थागत व्यवस्था, कार्य योजना और संसाधन जुटाना, सभी को साथ-साथ चलना होगा तथा इसी दृष्टि के अनुरूप व्यापक परिदृश्य देखा जाना चाहिए।” अपने संबोधन के दौरान, सचिव ने अनुकूलन के लिए समुदायों को सशक्त करने के क्रम में सूचनाओं के प्रचार-प्रसार की आवश्यकता पर जोर दिया। जब हम पीपीपी के बारे में बात करते हैं, तो हमें इसे ‘प्रो प्लैनेट पीपल’ के रूप में फिर से परिभाषित करने की जरूरत है, जो प्रधानमंत्री का एक स्पष्ट आह्वान भी है। हमें योजनाबद्ध और एकीकृत तरीके से सही दिशा में आगे बढ़ने में सक्षम होना चाहिए। उन्होंने निष्कर्ष के तौर पर कहा कि हम उन चुनौतियों से अवगत हैं, जो हमारे सामने हैं और अब कार्रवाई करने का समय है।

यह बात को रेखांकित करते हुए कि 90 प्रतिशत आपदाएं मौसम और जलवायु परिवर्तन से संबंधित हैं, श्री कमल किशोर, सदस्य सचिव, एनडीएमए और भारतीय सह अध्यक्ष, सीडीआरआई कार्यकारी समिति, ने इस बात पर जोर दिया कि आपदा जोखिम में कमी, अनुकूलन कार्य को जरूरी जानकारी दे सकती है। श्री किशोर ने कहा कि बेहतर पूर्वानुमान प्रणाली के साथ-साथ समुदायों के साथ गहरा जुड़ाव; आपदा जोखिम में कमी लाने की मुख्य बात रही है। उन्होंने जोखिम आकलन को अद्यतन करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।

समझदारी और दृढ़ता के साथ जोखिमों का आकलन करने की आवश्यकता पर ज़ोर देते हुए सुश्री दीपा बगई, प्रमुख, इंडिया ऑफ़िस, एनआरडीसी ने कहा, “हमें सभी राज्यों में अधिक तत्परता, संवेदनशीलता और संसाधनों के साथ ‘हीट एक्शन’ योजनाओं को लागू करने की आवश्यकता है। एक अच्छी योजना बनाना, समाधान का ही एक हिस्सा है। महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि हम उस समाधान को लागू करने में सक्षम हैं।”

चर्चा में भाग लेते हुए, इंटरनेशनल सस्टेनेबिलिटी स्टैंडर्ड बोर्ड (आईएसएसबी) के रणनीतिक गठबंधनों की निदेशक सुश्री मार्डी मैकब्रायन ने कहा कि निवेशकों के विश्वास को विकसित करने और पूंजी बाजारों को सामग्री, जलवायु और स्थायित्व की जानकारी देने के लिए बोर्ड सतत विकास के वैश्विक मानकों हेतु एक वैश्विक आधार बनाने के लिए तैयार है। सुश्री मैकब्रायन ने कहा, ‘यह शमन और अनुकूलन समाधान के वित्तपोषण में मदद करने के लिए वैश्विक उत्तर (ग्लोबल नॉर्थ) से विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं को धन स्थानांतरित करने में मदद करेगा।’

सुश्री रिनिका ग्रोवर, प्रमुख सतत विकास व सीएसआर, अपोलो टायर्स ने अनुकूलन व्यवस्था को समानता व समावेशी आधारित होने की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए कहा, “हम समुदाय के किसी भी वर्ग को जोखिम की स्थिति में नहीं छोड़ सकते।”

यह देखते हुए कि पिछले कुछ वर्षों में चरम मौसम की घटनाएं जलवायु परिवर्तन के घातक प्रभावों और अनुकूलन की तत्काल आवश्यकता के लिए आंखें खोलने वाली रही हैं, डॉ. विभा धवन, महानिदेशक, टेरी ने अपने स्वागत भाषण में कहा, “जब अनुकूलन की बात आती है तो खाद्य उत्पादन सहित सभी क्षेत्रों पर ध्यान देना आवश्यक है।”

जलवायु परिवर्तन से निपटने में भारत की अनुकूलन तैयारी को बढ़ाने के लिए उन तीन क्षेत्रों की पहचान करते हुए, जिन पर ध्यान देने की आवश्यकता है, श्री आरआर रश्मी, फेलो, टेरी ने कहा, “जलवायु जोखिमों और कमजोरियों का स्पष्ट आकलन करना महत्वपूर्ण है; इसके बाद, जोखिमों से निपटने के लिए समुदायों और राज्यों की अनुकूलन क्षमता और अंत में संसाधन।

कार्यक्रम में टेरी ने ‘भारत में अनुकूलन और अनुकूलन तैयारी पर दीर्घकालिक रणनीति’ पर एक प्रस्तुति भी दी।

 

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