New Ambassador Vikram Doraiswami visited Tibet immediately after assuming office; this sudden, highly sensitive visit left the ‘Dragon’ rattled. पद संभालते ही तिब्बत पहुंचे नए राजदूत विक्रम दोरईस्वामी, अचानक हुए इस बेहद संवेदनशील दौरे से ड्रैगन के उड़े होश

भारत और चीन के बीच चल रहे सीमा विवाद और कूटनीतिक तनातनी के बीच बीजिंग से एक बेहद बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है। चीन में भारत के नवनियुक्त राजदूत विक्रम दोरईस्वामी ने अपना कार्यभार संभालते ही एक ऐसा अप्रत्याशित कदम उठाया है, जिसने चीनी हुक्मरानों और ड्रैगन की कम्युनिस्ट सरकार के होश उड़ा दिए हैं। नए भारतीय राजदूत अचानक तिब्बत के स्वायत्त क्षेत्र (Tibet Autonomous Region) के दौरे पर पहुंच गए हैं। राजनयिक हलकों में इस दौरे को बेहद संवेदनशील और दूरगामी रणनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है। आमतौर पर किसी भी देश के राजदूत पद संभालने के तुरंत बाद बीजिंग से बाहर और खासकर तिब्बत जैसे विवादित और सामरिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र का रुख नहीं करते हैं, यही वजह है कि भारत के इस अचानक बदले कूटनीतिक रुख से चीन पूरी तरह हैरान-परेशान नजर आ रहा है।

बीजिंग में पैर जमाते ही तिब्बत की जमीन पर पहुंचे भारतीय राजदूत

राजनयिक सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, विक्रम दोरईस्वामी ने जैसे ही चीन में भारत के शीर्ष राजनयिक के रूप में आधिकारिक तौर पर कमान संभाली, उसके ठीक बाद उन्होंने तिब्बत की राजधानी ल्हासा और भारत-चीन सीमा से सटे कई महत्वपूर्ण इलाकों का दौरा करने का फैसला किया। इस यात्रा के दौरान उन्होंने तिब्बत में रह रहे भारतीय नागरिकों, बौद्ध भिक्षुओं और स्थानीय सांस्कृतिक केंद्रों का जायजा लिया। जानकारों का कहना है कि भारत सरकार के इस कदम के जरिए चीन को यह साफ संदेश देने की कोशिश की गई है कि भारत तिब्बत और वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के आसपास के घटनाक्रमों पर अपनी पैनी और सीधी नजर बनाए हुए है।

आखिर नए राजदूत के इस अचानक दौरे से क्यों घबरा गया है चीन

तिब्बत हमेशा से ही चीन के लिए एक बेहद संवेदनशील और कमजोर नस रहा है। चीन इस क्षेत्र में किसी भी विदेशी राजनयिक, विशेषकर भारतीय अधिकारियों की सीधी आवाजाही और सक्रियता को बेहद संशय की नजर से देखता है। विक्रम दोरईस्वामी के इस अचानक दौरे ने चीनी विदेश मंत्रालय को असमंजस में डाल दिया है। बीजिंग के रणनीतिकारों को डर है कि भारत अब तिब्बत कार्ड को नए सिरे से वैश्विक मंच पर हवा दे सकता है। इसके साथ ही, इस यात्रा के जरिए भारत ने यह भी साफ कर दिया है कि जब तक सीमा पर शांति बहाल नहीं होती और एलएसी से चीनी सेना पूरी तरह पीछे नहीं हटती, तब तक भारत अपने कूटनीतिक आक्रामक रुख में कोई कमी नहीं लाएगा।

भारत-चीन कूटनीतिक संबंधों पर क्या होगा इस बड़े कदम का असर

सैन्य और भू-राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विक्रम दोरईस्वामी का यह कदम भारतीय विदेश नीति में आए बड़े और साहसिक बदलाव को दर्शाता है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने चीन को उसी की भाषा में जवाब देने की रणनीति अपनाई है। इस हाई-प्रोफाइल तिब्बत यात्रा के बाद आने वाले दिनों में बीजिंग और नई दिल्ली के बीच बयानबाजी और तल्खी और ज्यादा बढ़ सकती है। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी इस दौरे पर अपनी आधिकारिक प्रतिक्रिया देने की तैयारी कर रही है, जबकि भारतीय विदेश मंत्रालय ने इसे एक नियमित और सामान्य प्रशासनिक दौरा करार दिया है। बहरहाल, इस एक दौरे ने पूरी दुनिया का ध्यान एक बार फिर तिब्बत और भारत-चीन सीमा विवाद की ओर खींच लिया है।

Comments are closed.