क्या नर्मदा नदी की राजनीति से तय होगी चुनावी जीत? जानें, कैसे पड़ेगा प्रभाव…

भोपाल : भोपाल में शिवभक्त और चित्रकूट में रामभक्त की भूमिका में नजर आये राहुल गांधी अब एक नए अवतार में नजर आने वाले हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि 06 अक्टूबर को राहुल जबलपुर में नर्मदा भक्त के रूप में नजर आएंगे. राहुल गांधी सबसे पहले नर्मदा घाट पहुंचेंगे, जहां नर्मदा का पूजन करने के बाद कन्याओं और साधुओं की भी पूजा करेंगे. इसके बाद वह अपने रोड शो की शुरुआत करेंगे.

राजनीति में कोई भी कुछ भी यूहीं नहीं करता. इसलिए यह समझना जरुरी है की राहुल गांधी को आखिर क्यों नर्मदा मैया के पास जाना पड़ रहा है. नर्मदा नदी का सांस्कृतिक, सामाजिक, ऐतिहासिक महत्व तो है ही. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि एक नदी का राजनीतिक महत्व कैसे?

इसलिए यदि आपकी राजनीति में जरा भी रूचि है तो यह जानना जरुरी है कि नर्मदा नदी कैसे मध्य प्रदेश की राजनीति की दिशा तय करती है. यह जानना और भी जरुरी इसलिये हो जाता है क्योंकि इस बार मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव देश के आगामी लोकसभा चुनावों को भी प्रभावित करने वाले हैं.

नर्मदा नदी के महत्व को समझने से पहले एक नजर इन बातों पर
– राहुल गांधी 6 अक्टूबर को नर्मदा जा रहे हैं.
– दिग्विजय सिंह नर्मदा परिक्रमा यात्रा कर चुके हैं.
– शिवराज सिंह चौहान भी नर्मदा बचाओ यात्रा निकाल चुके हैं.
– पीएम मोदी भी शिवराज की इस यात्रा के समापन समारोह में शामिल हो चुके हैं.
– नर्मदा तट पर बसे जिले एमपी की 230 विधानसभा सीटों में 110 सीट कवर करते हैं.

नर्मदा नदी का महत्व
नीचे दिए आंकड़ों से समझिये कि कैसे नर्मदा नदी मध्यप्रदेश की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक स्थितियों से सीधा सम्बन्ध रखती है. अनूपपुर जिले में मैकल पर्वत के अमरकंटक शिखर से निकली देश की प्राचीनतम यह नदी शिव की प्रिय है.

अमरकंटक की पहाडि़यों से निकलकर छत्तीसगढ, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात से होकर करीब 1310 किलोमीटर का रास्ता तय कर भरूच के आगे खंभात की खाडी में विलीन हो जाती है. मध्य प्रदेश में नर्मदा का प्रवाह क्षेत्र अमरकंटक(जिला अनूपपुर) से सोंडवा(जिला अलीराजपुर) तक 1077 किलोमीटर है, जो कि इसकी कुल लम्बाई का 82.24 प्रतिशत है. मध्य प्रदेश में नर्मदा नदी 16 जिलों, 51 विकासखण्डों, 600 ग्रामों, 1107 घाटों से होती हुई 1077 किलोमीटर का मार्ग तय करती है. नर्मदा भारतीय प्रायद्वीप की सबसे प्रमुख और भारत की पांचवी बड़ी नदी है.

कुल 21 सहायक नदियां हैं. नर्मदा नदी के किनारे 290 प्रमुख प्राचीन मंदिर, 161 धर्मशालाएं, 263 आश्रम स्थित हैं. नर्मदा विंध्याचल और सतपुड़ा पर्वतश्रृंखला के बीच से होते हुए पूर्व से पश्चिम की तरफ बहने वाली नदी है. अनूपपुर, डिण्‍डौरी, मण्‍डला, सिवनी, जबलपुर, नरसिंहपुर, हरदा, होशंगाबाद, खण्‍डवा, खरगोन, बडवानी, धार, देवास, सीहोर, रायसेन, अलीराजपुर.

नर्मदा का सामाजिक और आर्थिक महत्व
मध्यप्रदेश में नर्मदा का स्थान मां की तरह है और खासतौर पर मालवा क्षेत्र में अगाध श्रद्धा है. जैसे देश में गंगा के लिए. मालवा क्षेत्र के सामाजिक आर्थिक दोनों पहलुओं का संगम है मां नर्मदा. नर्मदा नदी को मध्यप्रदेश की जीवन-रेखा भी कहा जाता है. नर्मदा प्रदेश के बहुत बड़े क्षेत्र के लिए सिंचाई एवं पेयजल का बारहमासी जरिया है

नर्मदा नदी का कृषि, पर्यटन, तथा उद्योगों के विकास में महत्वपूर्ण योगदान है, इसके तटीय क्षेत्रों में उगाई जाने वाली मुख्य फसलें धान, गन्ना, दाल, तिलहन, आलू, गेहूँ एवं कपास हैं जो प्रदेश की खाद्यान्न व्यवस्था का महत्वपूर्ण स्रोत हैं.

नर्मदा नदी का राजनीति महत्व 
नर्मदा नदी में हर रोज टनों अवैध रेत खनन, व गैरकानूनी ढंग से संसाधनों के दोहन के चलते इसका सीधा असर किसानों पर पड़ता आया है. ऐसे में आगामी विधानसभा चुनाव में इसका सीधा असर देखने को मिलेगा. कांग्रेस लगातार सीधे शिवराज पर अवैध खनन का आरोप लगा रही है.

व्यापम के बाद नर्मदा अवैध खनन का मुद्दा शिवराज को सबसे ज्यादा परेशान करता आया है.कांग्रेस कार्यकर्ता राहुल गाँधी को कभी शिवभक्त, तो कभी रामभक्त और अब नर्मदा भक्त के रूप में प्रचारित कर रहे हैं.

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने हाल ही में कहा था कि प्रदेश में सत्ता में आने पर कांग्रेस ‘रामपथ’ और ‘नर्मदा परिक्रमा पथ’ का निर्माण करायेगी.

नर्मदा संरक्षण के लिए एक यात्रा का ऐलान करने वाले संत नामदेव शास्त्री उर्फ कंप्यूटर बाबा ने शिवराज सरकार से अपील की है, वह नर्मदा नदी को संरक्षित करने के लिए अलग से एक मंत्रालय का गठन करें.

शिवराज की नर्मदा यात्रा के समापन में मोदी बने राष्ट्र ऋषि
‘नमामि देवि नर्मदे’ यात्रा का संचालन 148 दिनों (11 दिसम्‍बर 2016 से 15 मई 2017) तक चला. इसके समापन समारोह में खुद पीएम मोदी ने शिरकत की थी और नर्मदा नदी के उद्गम स्थल पर पूजा पाठ भी किया. इस मौके पर पीएम मोदी ने कहा कि नदियों से ही हमारी अर्थव्यवस्था है,

नदियों को बचाना है. पीएम मोदी ने शिवराज चौहान की खुलकर प्रशंसा की थी. उन्होंने कहा था कि नर्मदा संरक्षण का अभियान चलाकर मध्यप्रदेश ने नदी, मानवता एवं पर्यावरण की रक्षा के लिए बहुत बड़ा काम किया है. उस वक़्त स्वामी अवधेशनंद जी ने मोदी को राष्ट्र ऋषि कहकर संबोधित किया था.

दिग्विजय की नर्मदा से राजनीतिक सूखे को सींचने की कोशिश 
दिग्विजय सिंह पिछले साल अपनी पत्नी के साथ दशहरे के दिन नर्मदा परिक्रमा पर निकले थे. उन्होंने इस यात्रा के लिए कांग्रेस महासचिव के पद से बाक़ायदा छह महीनों की लंबी छुट्टी ली थी. साथ चल रहीं उनकी 45 वर्षीय पत्नी अमृता राय ने भी इस यात्रा के लिए टीवी पत्रकार की अपनी नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया दिया था.

उस वक़्त ख़ास बात यह हुयी थी की खुद उमा भारती ने दिग्विजय को पत्र लिखकर उनकी तारीफ की थी. हालांकि मौजूदा तस्वीर में दिग्विजय बिलकुल गायब हैं. कहा यह भी गया था कि अपनी ख़त्म होती राजनीति और कद को बचाये रखने के लिए ही दिग्विजय इस यात्रा पर निकले थे.

सरदार सरोवर बांध का मध्य प्रदेश से संबंध
सरदार पटेल ने नर्मदा नदी पर बांध बनाने की पहल 1945 में की थी. नरेन्द्र मोदी सरकार ने 2014 में महज 20 दिन के कार्यकाल में नर्मदा बांध (सरदार सरोवर) की ऊंचाई 121. 92 मीटर से बढ़ाकर 138.72 मीटर (455 फीट) तक किए जाने की अनुमति दी थी. पिछले साल सितंबर में ही पीएम मोदी ने इस बांध का उद्घाटन किया था. बांध का सबसे ज्यादा फायदा गुजरात को मिलेगा. इससे यहां के 15 जिलों के 3137 गांव की 18.45 लाख हेक्टेयर जमीन की सिंचाई की जा सकेगी.

लेकिन बिजली का सबसे अधिक 57% हिस्सा मध्य प्रदेश को मिलेगा. महाराष्ट्र को 27% और गुजरात को 16% बिजली मिलेगी. राजस्थान को सिर्फ पानी मिलेगा. बांध की ऊंचाई बढ़ाने को लेकर भी तमाम संगठन और विपक्षी दल विरोध करते रहे हैं.

इसमें सबसे बड़ा नाम मेधा पाटेकर का रहा है. मुद्दा यह था की इन लोगो ने कहा था कि सरदार सरोवर का जलस्तर बढ़ाने से मध्य प्रदेश के नर्मदा घाटी स्थित धार, बड़वानी, सहित अन्य इलाकों के 192 गांव पूरी तरह डूब जाएंगे.

अब यह देखना दिलचस्प होगा कि आगामी मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में मां नर्मदे का आशीर्वाद किसे मिलता है. 15 साल से एमपी में बीजेपी कि सियासत को सींच रहे शिवराज या सत्ता का सूखा झेल रही कांग्रेस को. ये आशीर्वाद इसलिए भी अहम है क्योंकि हर बार लोकसभा चुनाव से ठीक पहले होने वाले इन राज्यों के चुनावों को सत्ता का सेमीफाइनल कहा जाता है.

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