IDEA की ताजा रिपोर्ट में भारत में ‘स्वतंत्र राजनीतिक दलों’ की स्थिति पर बड़ा खुलासा

अंतरराष्ट्रीय लोकतंत्र और चुनावी सहायता संस्थान यानी IDEA (International Institute for Democracy and Electoral Assistance) द्वारा जारी की गई एक नई और बेहद महत्वपूर्ण रिपोर्ट ने भारतीय राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर से तीखी बहस छेड़ दी है। इस वैश्विक रिपोर्ट में भारत में ‘स्वतंत्र राजनीतिक दलों’ (Independent Political Parties) की कार्यप्रणाली, उनकी आंतरिक स्वतंत्रता और समग्र लोकतांत्रिक स्वास्थ्य में लगातार गिरावट की ओर स्पष्ट इशारा किया गया है। रिपोर्ट के सार्वजनिक होने के बाद से ही देश-विदेश के राजनीतिक विश्लेषकों, विपक्षी दलों और नीति निर्माताओं के बीच चर्चाओं का दौर तेज हो गया है, क्योंकि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के नाते भारत की चुनावी व्यवस्था पर पूरी दुनिया की निगाहें टिकी रहती हैं। इस पूरे परिदृश्य में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार की अगुवाई वाले भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) की भूमिका और उनके द्वारा उठाए जा रहे कदमों को लेकर भी कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। वैश्विक संस्थाओं द्वारा इस तरह के आकलन और भारतीय प्रशासनिक तंत्र के बीच की यह खींचतान लोकतंत्र के विभिन्न पहलुओं को गहराई से समझने का एक नया अवसर प्रदान करती है, जिससे यह साफ होता है कि आधुनिक समय में स्वतंत्र और निष्पक्ष राजनीति को बनाए रखना कितना चुनौतीपूर्ण कार्य बनता जा रहा है।

क्या कहती है IDEA की रिपोर्ट और भारत के राजनीतिक दलों की मौजूदा दशा?

इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर डेमोक्रेसी एंड इलेक्टोरल असिस्टेंस द्वारा प्रकाशित इस वैश्विक सूचकांक में विभिन्न पैमानों के आधार पर दुनिया भर के देशों के लोकतांत्रिक संस्थानों का मूल्यांकन किया जाता है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश में राजनीतिक दलों के भीतर आंतरिक लोकतंत्र, निर्णय लेने की प्रक्रिया की पारदर्शिता, और वित्तपोषण (Funding) के स्रोतों में ऐसी प्रवृत्तियां देखी गई हैं जो स्वतंत्र राजनीतिक विकास के रास्ते में बाधा बन सकती हैं। रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि कई क्षेत्रीय और राष्ट्रीय दलों में नेतृत्व का केंद्रीकरण इस हद तक बढ़ चुका है कि छोटे और स्वतंत्र विचारों वाले नेताओं के लिए आगे बढ़ने का अवसर सीमित होता जा रहा है। इसके अलावा, चुनावी बॉन्ड और अन्य फंडिंग माध्यमों से जुड़ी पारदर्शिता के सवाल भी समय-समय पर इस बात को रेखांकित करते रहे हैं कि भारतीय राजनीति में धनबल और बाहुबल का प्रभाव किस प्रकार से स्वतंत्र राजनीतिक दलों की स्वतंत्र पहचान को प्रभावित कर रहा है। इन तमाम बिंदुओं के आधार पर रिपोर्ट ने भारतीय राजनीतिक व्यवस्था को लेकर एक चिंताजनक तस्वीर पेश की है, जिसे विपक्षी दल सरकार की विफलताओं के रूप में देख रहे हैं।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की अगुवाई में निर्वाचन आयोग की चुनौतियां और कदम

जब वैश्विक स्तर पर भारतीय लोकतंत्र और राजनीतिक दलों की स्वतंत्रता को लेकर इस तरह के सवाल उठाए जा रहे हैं, तब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में भारत निर्वाचन आयोग (ECI) की जिम्मेदारी और अधिक बढ़ जाती है। निर्वाचन आयोग देश में स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव कराने के लिए संवैधानिक रूप से बाध्य है। सीईसी ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल के दौरान चुनाव आयोग ने चुनावी प्रक्रिया को और अधिक डिजिटल, सुगम और पारदर्शी बनाने के लिए कई कड़े कदम उठाए हैं। आदर्श आचार संहिता के सख्ती से पालन से लेकर राजनीतिक दलों द्वारा दिए जाने वाले चुनावी खर्चों और विज्ञापनों पर कड़ी निगरानी रखने तक, आयोग लगातार अपनी प्रशासनिक पकड़ को मजबूत करने का प्रयास कर रहा है। हालांकि, राजनीतिक दलों के आंतरिक ढांचे में सुधार करना सीधे तौर पर निर्वाचन आयोग के सीधे अधिकार क्षेत्र में नहीं आता, क्योंकि इसके लिए राजनीतिक दलों के अपने संविधान और संसद में बनने वाले कानूनों की आवश्यकता होती है। इसके बावजूद, यह उम्मीद की जाती है कि चुनाव आयोग समय-समय पर ऐसे दिशा-निर्देश और सुझाव जरूर देता है जिससे राजनीतिक दलों के भीतर भी लोकतांत्रिक मूल्यों को बढ़ावा मिल सके।

राजनीतिक दलों की आंतरिक स्वायत्तता और भारतीय लोकतंत्र का भविष्य

भारतीय राजनीति के इतिहास पर नजर डालें तो यहाँ हमेशा से ही वैचारिक विविधता और क्षेत्रीय दलों का एक मजबूत वजूद रहा है। उत्तर से लेकर दक्षिण और पूरब से लेकर पश्चिम तक, भारत में सैकड़ों राजनीतिक दल सक्रिय हैं जो अपने-अपने क्षेत्रीय और सामाजिक मुद्दों को मुखरता से उठाते हैं। लेकिन IDEA की रिपोर्ट इस बात की ओर ध्यान आकर्षित करती है कि जब राजनीतिक दलों के भीतर ही आंतरिक चुनाव नियमित रूप से नहीं होते और फैसले कुछ गिने-चुने लोगों के हाथों में सिमट जाते हैं, तो वह पार्टी अपने आप में एक ‘स्वतंत्र दल’ के बजाय एक ‘पारिवारिक या व्यक्तिगत संगठन’ बनकर रह जाती है। इस तरह की प्रवृत्तियां न केवल पार्टी के भीतर के प्रतिभाशाली नेताओं का गला घोंटती हैं, बल्कि अंततः देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को भी अंदर से कमजोर करती हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि भारत को वैश्विक लोकतंत्र सूचकांक में अपनी स्थिति को सुधारना है, तो न केवल चुनाव आयोग को बल्कि खुद राजनीतिक दलों को भी अपनी आंतरिक कार्यप्रणाली में सुधार करने की दिशा में गंभीर आत्ममंथन करना होगा।

निष्कर्ष और आगे की राह

IDEA की यह रिपोर्ट भले ही बाहरी संस्था द्वारा तैयार की गई हो, लेकिन इसमें उठाए गए मुद्दे भारतीय लोकतंत्र की जमीनी हकीकत से पूरी तरह अछूते नहीं हैं। देश में स्वतंत्र राजनीतिक दलों का मजबूत होना एक स्वस्थ लोकतंत्र की सबसे बड़ी शर्त है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की अगुवाई में निर्वाचन आयोग पहले से ही चुनावी सुधारों को अमलीजामा पहनाने में जुटा हुआ है, लेकिन इसमें राजनीतिक इच्छाशक्ति की भी उतनी ही जरूरत है। आने वाले समय में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या भारतीय राजनीतिक दल अपनी आंतरिक कार्यशैली में पारदर्शिता लाकर इन वैश्विक चिंताओं का सकारात्मक जवाब दे पाते हैं या नहीं, क्योंकि लोकतंत्र की असली खूबसूरती जनता के विश्वास और संस्थाओं की निष्पक्षता में ही निहित होती है।

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