GST Special-एडवांस राशी लेने पर भी आपको टैक्स हाथो हाथ भरना ही है

GST-टाइम एव वैल्यूएशन ऑफ़ सप्लाई, और उस पर कब टैक्स भरना, अति अति महत्वपूर्ण, जरुर जाने l 

GST-अब एडवांस राशी लेने पर भी आपको टैक्स  हाथो हाथ भरना ही है

अब विक्रय राशी पर यदि ब्याज या लेट फीस या अन्य कोई चार्ज खरीददार को लगाया तो उस पर भी टैक्स भरना है

सबसे पहले यह समझे की सरकार टैक्स की वसूली सबसे पहले करना चाहती है मतलब आपका बिक्री का माल डिलीवर न भी हो लेकिन आपको उसके पेटे यदि एडवांस राशी मिली है तो आपको उसी माह उस राशी पर टैक्स भरना है जो की बाद में बिल बनेगा जब एडजस्ट हो जायेगा. यदि बिल बन गया तो तो कोई प्रॉब्लम नहीं उसी माह टैक्स भरना है भले ही भुगतान नहीं मिला हो. सरकार अब बिक्री पूर्ण होने का इन्तेजार नहीं करेगी. वर्तमान कानून में एडवांस राशी पर टैक्स नहीं भरना होता था. न ही urd खरीदी पर भरना होता था. मतलब टैक्स बिक्री पूर्ण होने पर ही लगता था. यदि आपने माल तो एडवांस में भेज दिया है तो नियमानुसार आपको माल भेजने के ३० दिन के अन्दर बिल फाड़ना ही है इस प्रकार आप अपने टैक्स की लायबिलिटी को आगे नहीं बड़ा सकते जो की अभी हम कर सकते थे.   

आपका माल पूर्ण रूप से बीके या नहीं. यदि आपने अन रजिस्टर्ड से खरीदी की है तो माल खरीदते से ही आपको रिवर्स चार्जेज के रूप में टैक्स भरना है भले ही बाद में आपको उस टैक्स का इनपुट क्रेडिट मिल जायेगा लेकिन आपके जेब से  टैक्स का पैसा तो आज ही लग जायेगा. मतलब किसी भी ट्रांसेक्शन को आपने बुक्स में लिया , और लेते ही आपको टैक्स उसी माह भरना है.  

अब ३ बातो को समझे , पहला सामान के वैल्यूएशन के क्या नियम है मतलब विक्रय राशी में किन परिस्थिति में क्या नियम लगेंगे ताकि विवाद ना हो. GST में वैल्यू ऑफ़ गुड को नही “ट्रांसेक्शन वैल्यू” को महत्व दिया है और ट्रांसेक्शन वैल्यू वह राशी होती है जो आपने खरीददार से माल के संभंध में पैसा लिया है यदि आपने बिल राशी के अलावा ब्याज, लेट फीस भी वसूल की है तो यह राशी भी आपकी बिक्री मानी जाकर इस राशी पर भी  आपको टैक्स भरना है मतलब उधार देकर ब्याज लेने पर भी आपको GST भरना है मतलब अब इंटरेस्ट आय पर भी GST लगेगा. आगे यदि माल को बेचने वाला आपनी तय जवाबदारी का खर्च वहां ना करके खरीददार पर बर्डन डालता है तो वह राशी भी बिक्री राशी में जोड़ी जाएगी जैसे यदि बिक्री की कंडीशन ये है की उसका भाडा या कमीशन या अन्य कोई खर्चा  बेचवाल ही देगा लेकिन बेचवाल ना देकर खरीददार दे देता है तो यह राशी बिक्री में जोड़ी जाएगी. अब डिस्काउंट यदि बाद में दिया जाता है तो उस पर इनपुट क्रेडिट ले लेने के कारण अब डेबिट क्रेडिट नोट बनाना पड़ेगा मतलब यह एक बिल के सामान ही रहेगा.

यदि कोई व्यक्ति माल के बदले दूसरा माल और पैसा दोनों देता है तो जो बदले में माल दे रहा है उसकी मार्किट वैल्यू देखकर दोनों को जोड़ कर बिक्री मानी जाएगी ना की नेट वैल्यू मानी जाएगी मतलब सरकार अब दोनों ट्रांसेक्शन को जोड़कर टैक्स लेंगी. अब एजेंट और मालिक के बिच माल आता जाता है तो बिक्री मानते वैल्यू जो फाइनल ग्राहक को मालिक के बिहाफ पर करना थी उसका ९०% से कम में मान्य नहीं होगी.

इस प्रकार अब व्यापारी को स्टॉक रखने की लगत बाद जाएगी और वह वर्तमान पूंजी में वह वर्तमान की तुलना में स्टॉक कम रख पायेगा मतलब व्यापारी को उसकी पूंजी पर ब्याज लग रहा है और उसने टैक्स भी भर दिया है उस डैड स्टॉक के टैक्स पर भी indirect ब्याज भर रहा है.

 

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