El Niño Winter Alert: सर्दियों में दिखेगा अल नीनो का विकराल रूप, कोलंबिया यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट से भारत में बढ़ी चिंता

वैश्विक जलवायु और मौसम के मिजाज को लेकर एक बेहद चिंताजनक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट सामने आई है। अमेरिका की प्रतिष्ठित कोलंबिया यूनिवर्सिटी के इंटरनेशनल रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट एंड सोसाइटी (IRI) ने अपने ताजा क्लाइमेट अपडेट में चेतावनी दी है कि साल 2026 के अंत और 2026-27 की सर्दियों के दौरान अल नीनो (El Niño) अपने विकराल यानी 'वेरी स्ट्रॉन्ग' (Very Strong / Super El Niño) रूप में पहुंच सकता है। संस्थान द्वारा 22 अलग-अलग वैश्विक मौसम मॉडल्स (13 डायनेमिक और 9 स्टैटिस्टिकल) के गहन विश्लेषण के बाद यह निष्कर्ष निकाला गया है कि सभी मॉडल्स इस बात पर एकमत हैं कि प्रशांत महासागर में समुद्री सतह का तापमान असामान्य रूप से तेजी से बढ़ रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह मौसमी घटना इतिहास में अब तक दर्ज की गई सबसे शक्तिशाली अल नीनो घटनाओं में से एक हो सकती है, जो पूरी दुनिया के साथ-साथ विशेष रूप से भारत के लिए कई मोर्चों पर भारी संकट खड़ा कर सकती है।

फरवरी 2027 तक 100% संभावना: सुपर अल नीनो के लौटने का वैज्ञानिक गणित

कोलंबिया यूनिवर्सिटी और अमेरिकी वेदर एजेंसी एनओएए (NOAA) के अनुसार, भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के नीनो 3.4 रीजन में समुद्र का तापमान सामान्य से 3 डिग्री सेल्सियस से भी अधिक ऊपर जा चुका है, जो आने वाले पीक महीनों (नवंबर-दिसंबर) में 4 डिग्री सेल्सियस तक की बढ़ोतरी छू सकता है। आईआरआई के वैज्ञानिकों का अनुमान है कि फरवरी 2027 तक अल नीनो की सक्रिय रहने की संभावना 100 प्रतिशत बनी हुई है। हालांकि 2027 के मध्य तक यह घटकर लगभग 61 प्रतिशत रहने का अनुमान है। मौसम विज्ञानियों के मुताबिक जब समुद्र की सतह इतने व्यापक पैमाने पर गर्म होती है, तो यह वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण (Global Atmospheric Circulation) और जेट स्ट्रीम्स की दिशा को पूरी तरह भटका देती है, जिससे सर्दी, गर्मी और बारिश का स्वाभाविक चक्र पूरी तरह पटरी से उतर जाता है।

भारत के लिए क्यों बजा खतरे का अलार्म? गर्म सर्दियां और रबी फसलों पर सीधा असर

भारत में अल नीनो का असर केवल मॉनसून को कमजोर करने तक ही सीमित नहीं रहता, बल्कि सर्दियों के मौसम पर भी इसका बहुत गहरा और घातक प्रभाव पड़ता है। भारत के लिए इसके मुख्य संभावित खतरे इस प्रकार हैं:

असामान्य रूप से गर्म और शुष्क सर्दियां: मजबूत अल नीनो के कारण उत्तर और मध्य भारत (पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश) में सामान्य से कम ठंड पड़ने और न्यूनतम तापमान सामान्य से अधिक बने रहने की प्रबल आशंका रहती है।

गेहूं और सरसों की फसलों को भारी नुकसान: देश में गेहूं की फसल को अंकुरित होने और दाना बनने के लिए कड़ाके की ठंड (चिलिंग आवर्स) की सख्त जरूरत होती है। यदि दिसंबर और जनवरी में रात का तापमान सामान्य से ऊपर रहा, तो गेहूं की पैदावार और दाने के आकार पर बेहद बुरा असर पड़ सकता है, जिससे देश में खाद्यान्न सुरक्षा और महंगाई की समस्या गहरा सकती है।

कमजोर पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances): अल नीनो जेट स्ट्रीम को उत्तर की तरफ धकेल देता है, जिससे उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में सर्दियों की बारिश (मावठ) और पहाड़ों (कश्मीर, हिमाचल, उत्तराखंड) में बर्फबारी काफी कम हो सकती है। बर्फबारी घटने से गर्मियों में नदियों और बांधों में पानी का इनफ्लो सूखने का संकट खड़ा हो जाएगा।

आईओडी (Indian Ocean Dipole) का पॉजिटिव रुख क्या भारत को दे पाएगा राहत?

इस भयानक खतरे के बीच भारतीय मौसम वैज्ञानिकों के लिए एक उम्मीद की किरण भी दिख रही है। आईआरआई और आईएमडी के डेटा के अनुसार, हिंद महासागर में 'इंडियन ओशन डिपोल' (IOD) की स्थिति सितंबर से दिसंबर 2026 के बीच काफी हद तक सकारात्मक (Positive IOD) रहने का अनुमान है। जलवायु विज्ञान में पॉजिटिव आईओडी को अल नीनो का प्राकृतिक काउंटर-बैलेंस माना जाता है। यदि पॉजिटिव आईओडी मजबूत रहता है, तो यह अल नीनो के सूखे और अत्यधिक गर्मी के प्रभाव को कुछ हद तक दबाने और नमी लाने में मदद कर सकता है। हालांकि, इतिहास बताता है कि जब अल नीनो 'सुपर' कैटेगरी का हो जाता है, तो पॉजिटिव आईओडी का असर सीमित रह जाता है।

जलाशयों का जलस्तर और गर्मियों में पेयजल संकट की नई चुनौती

भारत में अधिकांश प्रमुख बांध और जलाशय दक्षिण-पश्चिम मॉनसून और पोस्ट-मॉनसून बारिश पर निर्भर रहते हैं। यदि अल नीनो के असर से विंटर रेनफॉल और स्नोफॉल कम होता है, तो 2027 की आने वाली गर्मियों में दक्षिण भारत (कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश) और पश्चिमी भारत (महाराष्ट्र, गुजरात) के जलाशयों में पानी का संकट गहरा सकता है। भूजल का अत्यधिक दोहन होने से बिजली की मांग अचानक बढ़ जाएगी, क्योंकि सिंचाई और एयर कंडीशनिंग के लिए ग्रिड पर भारी लोड पड़ेगा। इससे न केवल किसानों की कृषि लागत बढ़ेगी, बल्कि शहरों में पेयजल की भीषण किल्लत भी देखने को मिल सकती है।

नीति आयोग, कृषि मंत्रालय और किसानों के लिए जरूरी अलर्ट

कोलंबिया यूनिवर्सिटी की इस गंभीर चेतावनी के बाद भारतीय मौसम विभाग (IMD), नीति आयोग और कृषि वैज्ञानिकों ने केंद्र व राज्य सरकारों को सतर्कता बरतने की सलाह दी है। वैज्ञानिकों का कहना है कि किसानों को तापमान सहन करने वाली (Heat-Tolerant) गेहूं की प्रजातियों (जैसे HD-3385, PBW-725) की बुआई करने की सलाह दी जानी चाहिए। इसके अलावा सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों (ड्रिप और स्प्रिंकलर) को बढ़ावा देना, वाटर शेड मैनेजमेंट को मजबूत करना और समय रहते बफर स्टॉक का प्रबंधन करना बेहद जरूरी होगा ताकि मौसम की इस संभावित मार से देश की अर्थव्यवस्था और अन्नदाताओं को सुरक्षित रखा जा सके।

Comments are closed.