TRAI के कड़े नियमों के बावजूद प्राइवेट बैंकों के फर्जी 10 डिजिट नंबरों से दिनभर स्पैम कॉल? जानिए मिलीभगत के आरोपों का सच और बचने का सटीक रास्ता
स्मार्टफोन पर एक अनजान 10 अंकों का मोबाइल नंबर फ्लैश होता है। किसी जरूरी काम, मीटिंग या सफर में व्यस्त व्यक्ति यह सोचकर कॉल उठाता है कि शायद कोई परिजन, कूरियर वाला या जरूरी दफ्तर का फोन होगा। लेकिन जैसे ही कॉल रिसीव होती है, दूसरी तरफ से आवाज आती है—”सर, क्या आपको पर्सनल लोन चाहिए?” या “मैम, आपका लाइफटाइम फ्री क्रेडिट कार्ड अप्रूव हो गया है!” यह स्थिति देश के किसी एक कोने की नहीं, बल्कि हर आम भारतीय मोबाइल उपभोक्ता की रोजमर्रा की मानसिक प्रताड़ना बन चुकी है। सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि ये कॉल्स किसी अनजान सड़क छाप कंपनी से नहीं, बल्कि देश के बड़े-बड़े नामी प्राइवेट बैंकों, एनबीएफसी और उनकी सहयोगी कंपनियों के नाम पर आते हैं। उपभोक्ता सवाल उठा रहे हैं कि जब भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (TRAI) ने कड़े नियम बनाए हैं, तो उसकी नाक के नीचे खुलेआम अनरजिस्टर्ड टेलीमार्केटर (UTM) सामान्य मोबाइल सिम कार्ड्स का इस्तेमाल करके लोगों की निजता पर हमला कैसे कर रहे हैं? क्या यह तंत्र की विफलता है, सिस्टम की लापरवाही है या फिर टेलीकॉम ऑपरेटरों और बैंकों के बीच किसी अनकही मिलीभगत का नतीजा?
नियमों के अनुसार, किसी भी वैध बैंक, वित्तीय संस्थान या टेलीमार्केटर को अपने ग्राहकों को प्रमोशनल या सर्विस कॉल करने के लिए एक विशेष नंबर सीरीज का इस्तेमाल करना अनिवार्य होता है। पहले यह 140 सीरीज से शुरू होती थी और अब वित्तीय संस्थानों के लिए 1600 या 160 सीरीज निर्धारित की गई है। इन नंबरों की सबसे बड़ी खासियत यह होती है कि स्क्रीन पर नंबर देखते ही उपभोक्ता समझ जाता है कि यह किसी बैंक या कंपनी की मार्केटिंग कॉल है। यदि उपभोक्ता ने डीएनडी (Do Not Disturb) एक्टिवेट किया हुआ है, तो इन नंबरों से कॉल आ ही नहीं सकती। इसी कानूनी अड़चन से बचने के लिए प्राइवेट बैंक और उनके थर्ड-पार्टी डायरेक्ट सेलिंग एजेंट्स (DSA) ने एक बेहद शातिर रास्ता निकाला है। वे बल्क में सामान्य 10 अंकों वाले पर्सनल सिम कार्ड्स (Personal SIM Cards) खरीदते हैं और उनसे रोजाना सैकड़ों लोगों को कॉल करते हैं। चूंकि ये नंबर सामान्य मोबाइल नंबर जैसे दिखते हैं, इसलिए टेलीकॉम कंपनियों के ऑटोमेटेड फिल्टर्स इन्हें तुरंत नहीं पकड़ पाते और उपभोक्ता भी धोखे में आकर फोन उठा लेता है।
जब भी किसी बैंक पर अनचाही कॉलिंग को लेकर सवाल उठते हैं, तो बैंक तुरंत पल्ला झाड़ लेते हैं कि यह कॉल उनके आधिकारिक दफ्तर से नहीं बल्कि किसी ‘थर्ड-पार्टी वेंडर’ या कमीशन एजेंट द्वारा की गई है। असल में यह एक ऐसा जटिल कॉरपोरेट स्ट्रक्चर है जो जवाबदेही से बचने के लिए तैयार किया गया है। बैंक अपने लोन, क्रेडिट कार्ड और इंश्योरेंस के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए बाहरी एजेंसियों और डीएसए को भारी कमीशन पर हायर करते हैं। इन एजेंसियों के पास कोई आधिकारिक कॉलिंग सिस्टम नहीं होता; वे छोटे-छोटे कॉल सेंटरों में युवाओं को बिठाकर अनरजिस्टर्ड पर्सनल सिम बांट देते हैं। इन एजेंट्स को हर कार्ड या लोन बेचने पर टारगेट और इन्सेंटिव मिलता है, इसलिए वे परवाह किए बिना सुबह से रात तक अंधाधुंध कॉलिंग करते हैं। बैंक इस बात से भली-भांति वाकिफ होते हैं कि उनका बिजनेस इन्हीं एजेंट्स के जरिए आ रहा है, लेकिन सीधे तौर पर कानूनी शिकंजे से बचने के लिए वे कागजों पर खुद को इससे अलग दिखाते हैं। यही वह दोहरा मापदंड है जिसे जनता सिस्टम की ‘मिलीभगत’ के रूप में देखती है।
एक बड़ा सवाल यह भी है कि आखिर इन अनरजिस्टर्ड टेलीमार्केटर्स के पास आपका फोन नंबर, नाम और यहां तक कि आपकी वित्तीय स्थिति की जानकारी कैसे पहुंचती है? दरअसल, यह देश भर में फैले अनियंत्रित डेटा ब्रोकरों का खेल है। जब आप किसी मॉल में बिलिंग के वक्त नंबर देते हैं, किसी वेबसाइट पर ऑनलाइन फॉर्म भरते हैं, या किसी थर्ड-पार्टी ऐप को अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट का एक्सेस देते हैं, तो वह डेटा सुरक्षित नहीं रहता। वह डेटा चंद रुपयों में बिककर टेलीमार्केटिंग एजेंसियों तक पहुंच जाता है। इसके अलावा, कई बार छोटे वित्तीय प्लेटफॉर्म्स और ई-कॉमर्स साइट्स भी अपने ग्राहकों का डेटाबेस इन कॉलिंग नेटवर्क्स के साथ साझा करते हैं। इस चोरी किए गए डेटा के आधार पर कॉल सेंटर के कर्मचारी लोगों को फोन मिलाते हैं और कई बार तो मना करने पर भी बार-बार अलग-अलग नंबरों से कॉल करके प्रताड़ित करते हैं, जिससे यह मामला केवल मार्केटिंग का नहीं बल्कि सीधे-सीधे मानसिक उत्पीड़न और निजता के हनन का बन जाता है।
जनता के लगातार बढ़ते आक्रोश के बीच ट्राई और दूरसंचार विभाग (DoT) पर हमेशा यह दबाव रहता है कि वे इस पर पूरी तरह लगाम लगाएं। ट्राई का कहना है कि समस्या मिलीभगत की नहीं बल्कि उस तकनीकी और कानूनी खाई की है जिसका फायदा ये फर्जी एजेंट्स उठाते हैं। टेलीकॉम कंपनियों के पास एक सामान्य नागरिक के सिम और एक अनरजिस्टर्ड टेलीमार्केटर के सिम में फर्क करना चुनौतीपूर्ण होता है, क्योंकि दोनों एक ही नेटवर्क और स्पेक्ट्रम का उपयोग करते हैं। हालांकि, हाल के दिनों में नियमों को और अधिक कड़ा किया गया है:
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एआई और मशीन लर्निंग आधारित फिल्टर्स: टेलीकॉम कंपनियों को निर्देश दिए गए हैं कि यदि किसी सामान्य 10 डिजिट नंबर से असामान्य रूप से बहुत अधिक कॉल्स (Bulk Calling) की जा रही हैं, तो एआई सिस्टम उस नंबर को तुरंत सस्पेक्टेड स्पैम की श्रेणी में डाले और उसकी सेवा बंद करे।
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160 सीरीज का अनिवार्य नियम: सभी बैंकों और वित्तीय संस्थाओं को आदेश दिया गया है कि वे अपनी सभी प्रमोशन व वेरिफिकेशन कॉल्स को सिर्फ 160 सीरीज पर शिफ्ट करें, ताकि बिना इस सीरीज के आने वाली हर बैंक संबंधी कॉल को फर्जी माना जा सके।
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सिम ब्लैकलिस्टिंग और जुर्माने: यदि कोई अनरजिस्टर्ड टेलीमार्केटर पकड़ा जाता है, तो न केवल उसका कनेक्शन काटा जा रहा है बल्कि उस व्यक्ति या एजेंसी के सभी अन्य कनेक्शनों को दो साल तक के लिए ब्लैकलिस्ट करने और भारी आर्थिक जुर्माना लगाने के प्रावधान किए गए हैं।
यदि आप भी रोजाना ऐसी अनचाही कॉल्स से तंग आ चुके हैं, तो केवल फोन काटकर गुस्सा होने के बजाय इन आधिकारिक और कानूनी रास्तों का उपयोग करके सिस्टम को मजबूर करें:
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दूरसंचार विभाग का ‘चक्षु’ (Chakshu) पोर्टल: भारत सरकार के ‘संचार साथी’ (Sanchar Saathi) पोर्टल पर जाकर ‘चक्षु’ सुविधा का उपयोग करें। यहां आप उन सभी 10 डिजिट नंबरों की सीधे शिकायत दर्ज कर सकते हैं जिनसे फर्जी बैंक लोन, लॉटरी या फ्रॉड कॉल्स आ रही हैं। यह पोर्टल सीधे ऐसे नंबरों की जांच करके उन्हें ब्लॉक करता है।
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TRAI DND 3.0 ऐप का इस्तेमाल: अपने स्मार्टफोन में ट्राई का आधिकारिक DND ऐप डाउनलोड करें। इस ऐप के जरिए आप सीधे अपने कॉल लॉग से उस स्पैम नंबर का चयन करके अपने टेलीकॉम ऑपरेटर (Jio, Airtel, Vi, BSNL) के पास शिकायत दर्ज करा सकते हैं। ऑपरेटर को निर्धारित समय के भीतर उस नंबर पर कार्रवाई करनी होती है।
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एसएमएस के जरिए शिकायत (1909 पर): आप अपने फोन के मैसेज बॉक्स में जाकर “COMP TEL NO XXXXXXXXXX, dd/mm/yy, Time” टाइप करके 1909 पर भेज सकते हैं (जहाँ XXXXXXXXXX वह नंबर है जिससे कॉल आई थी)। यह शिकायत कॉल आने के तीन दिनों के भीतर भेजी जानी चाहिए।
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बैंकिंग लोकपाल और कंज्यूमर फोरम: यदि कोई विशेष बैंक बार-बार मना करने के बावजूद लगातार आपको परेशान कर रहा है, तो आप उस बैंक के नोडल अधिकारी और उसके बाद सीधे भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के बैंकिंग लोकपाल (Banking Ombudsman) तथा राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन (NCH) पर ‘अनएथिकल प्रैक्टिसेज’ के खिलाफ शिकायत दर्ज करवा सकते हैं।
जब तक आम नागरिक जागरूक होकर इन अनरजिस्टर्ड नंबरों की शिकायत दर्ज नहीं कराएंगे और नियामक संस्थाएं इन बैंकों पर सीधे करोड़ों का जुर्माना नहीं लगाएंगी, तब तक यह गोरखधंधा पूरी तरह बंद नहीं होगा। जनता की सक्रियता और सख्त कानूनी चाबुक ही इस दैनिक मानसिक प्रताड़ना का स्थायी समाधान बन सकता है।
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