क्या भारत में 13 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए बैन होगा सोशल मीडिया? दिल्ली हाईकोर्ट और राज्यों के कड़े कदमों से बढ़ी हलचल

डिजिटल युग में स्मार्टफोन और इंटरनेट जहां पढ़ाई का जरिया बने हैं, वहीं कम उम्र के बच्चों में स्क्रीन की लत, रील्स का नशा और मानसिक तनाव एक गंभीर राष्ट्रीय चिंता का विषय बन चुका है। विभिन्न स्वास्थ्य और तकनीकी सर्वेक्षणों के अनुसार, देश के शहरी और अर्ध-शहरी इलाकों में लगभग हर 10 में से 9 बच्चे रोजाना 3 से 5 घंटे स्मार्टफोन का इस्तेमाल कर रहे हैं। इस चिंताजनक स्थिति के बीच भारत में 13 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने और 13 से 16 वर्ष के किशोरों के लिए रात में सोशल मीडिया ब्लॉक करने की मांग ने कानूनी और प्रशासनिक स्तर पर जोर पकड़ लिया है।

दिल्ली हाईकोर्ट में हाल ही में दाखिल एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका (PIL) में यह मांग उठाई गई कि 13 वर्ष से कम आयु के बच्चों की पहुंच सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स (जैसे इंस्टाग्राम, फेसबुक, यूट्यूब और स्नैपचैट) पर पूरी तरह प्रतिबंधित की जाए। याचिकाकर्ताओं ने यह भी गुहार लगाई कि 13 से 16 वर्ष के बच्चों के लिए देर रात (नाइट-टाइम) सोशल मीडिया लॉग-इन और नोटिफिकेशन पर रोक लगाने के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश बनाए जाएं।

दिल्ली हाईकोर्ट की पीठ ने मामले की गंभीरता को स्वीकार करते हुए केंद्र सरकार (इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय) को इस पूरे विषय पर विचार करने और कानून के तहत उचित निर्णय लेने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने सरकार को यह छूट भी दी है कि वह नीतिगत फैसला लेते समय याचिकाकर्ताओं के प्रतिनिधियों को व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर दे सकती है।

केंद्र सरकार के स्तर पर नीतिगत मंथन के साथ-साथ कई राज्य सरकारों ने भी अपने स्तर पर सख्त कदम उठाने का ऐलान किया है।

  • कर्नाटक: राज्य सरकार ने 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने का ऐतिहासिक प्रस्ताव पेश किया है।

  • आंध्र प्रदेश: राज्य सरकार ने 13 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के एक्सेस पर रोक लगाने की समयसीमा तय की है।

  • वैश्विक प्रभाव: भारत में यह बहस ऑस्ट्रेलिया और ब्राजील जैसे देशों द्वारा बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन के सख्त कानून लागू करने के बाद और तेज हुई है।

बाल रोग विशेषज्ञों और मनोचिकित्सकों के अनुसार, सोशल मीडिया ऐप्स के एल्गोरिदम खास तौर पर बच्चों के दिमाग को बांधकर रखने (Dark Patterns & Infinite Scroll) के लिए डिजाइन किए गए हैं। इससे बच्चों के दिमाग में डोपामाइन का कृत्रिम उछाल आता है, जिसके कारण:

  • एकाग्रता और पढ़ाई में गिरावट: लगातार रील्स और शॉर्ट वीडियो देखने से बच्चों का अटेंशन स्पैन घटकर कुछ ही सेकंड्स का रह गया है।

  • नींद का पैटर्न खराब होना: देर रात तक मोबाइल स्क्रीन से निकलने वाली ‘ब्लू लाइट’ मेलाटोनिन हार्मोन को रोकती है, जिससे बच्चों में अनिद्रा, चिड़चिड़ापन और स्वभाव में आक्रामकता बढ़ रही है।

  • साइबर बुलिंग और बॉडी डिस्मॉर्फिया: सोशल मीडिया पर लाइक्स, कमेंट्स और ब्यूटी फिल्टर्स के चलते 10 से 15 साल के बच्चों में हीनभावना और डिप्रेशन के मामले तेजी से बढ़े हैं।

भारत सरकार ने बच्चों की डिजिटल सुरक्षा के लिए डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) एक्ट, 2023 में कड़े प्रावधान किए हैं। इस कानून के तहत:

  • 18 वर्ष से कम आयु के किसी भी व्यक्ति को ‘बच्चा’ माना गया है।

  • सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स को बच्चों का डेटा प्रोसेस करने से पहले माता-पिता की स्पष्ट सहमति (Verifiable Parental Consent) लेना अनिवार्य किया गया है।

  • प्लेटफॉर्म्स पर बच्चों को टारगेट करके विज्ञापन दिखाने (Targeted Ads) और उनके ऑनलाइन व्यवहार की ट्रैकिंग करने पर पूरी तरह रोक लगाई गई है। नियमों का उल्लंघन करने वाली टेक कंपनियों पर 200 करोड़ रुपये तक के भारी जुर्माने का प्रावधान है।

विशेषज्ञों का मानना है कि केवल पूर्ण प्रतिबंध लगाने से बच्चे वीपीएन (VPN) या फर्जी जन्मतिथि का सहारा ले सकते हैं। इसलिए भारत सरकार एक ‘ग्रेडेड रेगुलेशन मॉडल’ पर भी विचार कर रही है:

  • 8 से 12 वर्ष: सोशल मीडिया पर लगभग पूर्ण प्रतिबंध और केवल सुरक्षित एजुकेशनल ऐप्स का एक्सेस।

  • 12 से 16 वर्ष: दिन में अधिकतम 1 से 2 घंटे की समय सीमा, रात 10 बजे के बाद ऑटोमैटिक स्क्रीन लॉक और माता-पिता के अकाउंट से लिंक अनिवार्य।

  • 16 से 18 वर्ष: संवेदनशील कंटेंट पर सख्त फिल्टर और डिफ़ॉल्ट प्राइवेसी सेटिंग्स।

बच्चों को डिजिटल खतरे से बचाने के लिए तकनीकी प्लेटफॉर्म्स, सरकार, स्कूल और माता-पिता चारों के संयुक्त प्रयासों की आवश्यकता है ताकि बच्चों का मानसिक और शारीरिक विकास सुरक्षित रह सके।

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