बंगाल SIR विवाद में सुप्रीम कोर्ट सख्त: 33 लाख अपीलों के लिए सिर्फ 19 ट्रिब्यूनल पर चीफ जस्टिस बोले- ‘इस सुस्त रफ्तार से तो अगला चुनाव भी आ जाएगा’, चुनाव आयोग से मांगा पूरा ब्योरा

पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) के दौरान हटाए गए या विवादित 33 लाख से अधिक नागरिकों के मताधिकार को लेकर कानूनी लड़ाई अब अपने बेहद निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। राज्य में अपीलों के निपटारे के लिए गठित महज 19 अपीलीय ट्रिब्यूनलों की सुस्त कार्यप्रणाली और धीमी गति पर सुप्रीम कोर्ट ने गहरा असंतोष और चिंता व्यक्त की है। कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ ने निर्वाचन आयोग को सख्त लहजे में हिदायत दी है कि यदि अपीलों के निस्तारण में इसी प्रकार महीनों और वर्षों का समय लगता रहा, तो अगला चुनाव आ जाएगा लेकिन आम नागरिकों को न्याय नहीं मिल पाएगा।

33 लाख से अधिक पेंडिंग केस और महज 19 ट्रिब्यूनल: आंकड़ों का उलझा गणित

पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया के तहत करीब 58 लाख से अधिक नामों को ड्राफ्ट लिस्ट से बाहर किया गया था। इसमें से तार्किक विसंगतियों (Logical Discrepancies), शिफ्टिंग या अन्य तकनीकी कारणों से बाहर हुए लगभग 33 से 34 लाख लोगों ने अपने मताधिकार को दोबारा बहाल कराने के लिए अपीलीय ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटाया है। हालांकि, इतने विशालकाय आंकड़े की सुनवाई के लिए पूरे राज्य में केवल 19 स्वतंत्र अपीलीय ट्रिब्यूनल ही कार्यरत हैं। यदि गणितीय दृष्टिकोण से देखा जाए, तो औसतन हर एक ट्रिब्यूनल के पास 1.75 लाख से अधिक अपीलों का विशाल बोझ मौजूद है। यदि एक ट्रिब्यूनल हर दिन 300 मामलों पर भी फैसला सुनाता है, तब भी सभी लंबित मामलों को सुलझाने में सालों का समय लग जाएगा। कोर्ट में याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि अब तक कुल अपीलों के 1 प्रतिशत हिस्से का भी निपटारा नहीं हो पाया है, जिससे लाखों योग्य नागरिक लोकतांत्रिक प्रक्रिया से बाहर होने की कगार पर हैं।

सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख: चुनाव आयोग से मांगा ट्रिब्यूनल्स का पूरा रिपोर्ट कार्ड

मामले की संवेदनशीलता और नागरिकों के मौलिक लोकतांत्रिक अधिकारों को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने भारत निर्वाचन आयोग (ECI) को नोटिस जारी कर विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। शीर्ष अदालत ने चुनाव आयोग से स्पष्ट रूप से पूछा है कि अब तक राज्यों के अपीलीय ट्रिब्यूनलों में कुल कितनी अपीलें दर्ज हुई हैं, उनमें से कितनों पर अंतिम फैसला आ चुका है और कितने मामले अभी भी पेंडिंग हैं। इसके साथ ही जस्टिस बागची ने संकेत दिया कि सुप्रीम कोर्ट ट्रिब्यूनल की मौजूदा संख्या, उनके काम करने के घंटे, ऑनलाइन बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता और प्रतिदिन के डिस्पोजल रेट (Disposal Rate) की खुद समीक्षा करेगा ताकि आम जनता को समयबद्ध तरीके से राहत मिल सके।

राशन कार्ड और सामाजिक योजनाओं पर असर का उठा मुद्दा: हाई कोर्ट का रुख

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से यह गंभीर मुद्दा भी उठाया गया कि वोटर लिस्ट से नाम हटने के कारण कई नागरिकों को राशन (PDS) और अन्य राज्य स्तरीय सामाजिक कल्याण योजनाओं के लाभ से वंचित किया जा रहा है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इस पर स्पष्ट किया कि मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने की ट्रिब्यूनल प्रक्रिया और राशन मिलने का प्रशासनिक मुद्दा दो अलग-अलग विषय हैं। शीर्ष अदालत ने कहा कि यदि किसी नागरिक को PDS या अन्य योजनाओं का लाभ रोके जाने की शिकायत है, तो वे संबंधित राहत के लिए कलकत्ता हाई कोर्ट के समक्ष अपनी याचिका दाखिल कर सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट का मुख्य फोकस फिलहाल अपीलीय ट्रिब्यूनल व्यवस्था को तेज और सुचारू बनाने पर ही केंद्रित रहेगा।

25 अगस्त को होगी अगली महत्वपूर्ण सुनवाई: व्यवस्था में बड़े बदलाव की उम्मीद

सुप्रीम कोर्ट ने इस संवेदनशील मामले को 25 अगस्त 2026 की तारीख के लिए सूचीबद्ध किया है, जहां चुनाव आयोग को ट्रिब्यूनल के प्रदर्शन और इंफ्रास्ट्रक्चर की पूरी रिपोर्ट पेश करनी होगी। चुनाव आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ वकील ने आश्वस्त किया है कि वे लॉजिस्टिक्स और जनशक्ति से जुड़ी सभी कमियों का डेटा जुटाकर कोर्ट के समक्ष रखेंगे। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट 25 अगस्त की सुनवाई में ट्रिब्यूनल की संख्या बढ़ाने, जजों के लिए डिजिटल/ऑनलाइन हियरिंग की व्यवस्था करने और अपीलों के निपटारे की एक निश्चित समय-सीमा (Timeline) तय करने के निर्देश दे सकता है।

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