लापता बच्चों की तलाश के लिए ‘नेशनल डीएनए डेटाबेस’ की मांग, सुप्रीम कोर्ट ने बताया बेहद संवेदनशील मुद्दा:
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक महत्वपूर्ण याचिका पर सुनवाई करते हुए लापता बच्चों की पहचान और उनकी घर वापसी के लिए ‘राष्ट्रीय डीएनए और बायोमीट्रिक पहचान प्रणाली’ स्थापित करने की मांग को एक अत्यंत संवेदनशील मुद्दा करार दिया है। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि वैज्ञानिक तरीकों से बच्चों की पहचान बहाल करना वक्त की जरूरत है, लेकिन इसके लिए एक ठोस और सुरक्षित रूपरेखा तैयार करना अनिवार्य है।
चीफ जस्टिस ने वकील से मांगा ‘होमवर्क’
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ ने याचिकाकर्ता के वकील से इस जटिल समस्या का व्यावहारिक समाधान सुझाने को कहा है। चीफ जस्टिस ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा:
“यह मुद्दा निश्चित रूप से बहुत संवेदनशील है। आप अपनी टीम के साथ थोड़ा होमवर्क करें और हमें एक विस्तृत रूपरेखा (Blueprint) दें कि इसका समाधान क्या होना चाहिए। यह भी सोचें कि विभिन्न संस्थानों को एक साझा मंच पर लाने के लिए एक सहयोगात्मक तंत्र (Collaborative Mechanism) कैसे बनाया जा सकता है।”
क्या है याचिकाकर्ता की मुख्य मांगें?
याचिका में केंद्र सरकार, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निम्नलिखित कदम उठाने के निर्देश देने की मांग की गई है:
राष्ट्रीय डीएनए प्रणाली: लापता और बचाए गए बच्चों के लिए एक नेशनल डीएनए और बायोमीट्रिक डेटाबेस बनाया जाए।
अनिवार्य सैंपलिंग: सभी अज्ञात बचाए गए बच्चों और अपने लापता बच्चों की तलाश कर रहे माता-पिता का डीएनए नमूना लेना अनिवार्य किया जाए।
वैज्ञानिक मिलान: वैज्ञानिक आधार पर डेटा का मिलान कर बच्चों को उनके वास्तविक अभिभावकों तक पहुँचाया जा सके।
वैधानिक सुरक्षा: इस संवेदनशील डेटा के दुरुपयोग को रोकने के लिए उचित कानूनी और वैधानिक सुरक्षा उपाय सुनिश्चित किए जाएं।
अगले कदम और सुनवाई
अदालत ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए याचिकाकर्ता को चार सप्ताह का समय दिया है ताकि वे एक प्रभावी मॉडल पेश कर सकें। मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद तय की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ऐसी कोई प्रणाली लागू होती है, तो यह मानव तस्करी (Human Trafficking) के शिकार बच्चों और मेलों या भीड़भाड़ वाले इलाकों में बिछड़े बच्चों को ढूंढने में एक क्रांतिकारी कदम साबित होगा।
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