असम के मिर्ज़ा में भारतीय इतिहास संकलन समिति का 36वां प्रांतीय सम्मेलन शुरू

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समग्र समाचार सेवा
मिर्ज़ा (असम), 04 जनवरी: भारतीय इतिहास को स्वदेशी दृष्टिकोण और तथ्यपरक आधार पर पुनः स्थापित करने के उद्देश्य से भारतीय इतिहास संकलन समिति (बीएचआईएस), असम का 36वां प्रांतीय सम्मेलन शनिवार को मिर्ज़ा स्थित दक्षिण कामरूप कॉलेज के सुधाकंठ डॉ. भूपेन हज़ारिका सभागार में आरंभ हुआ। दो दिवसीय इस सम्मेलन में विशेष रूप से असम की समृद्ध सभ्यतागत और सांस्कृतिक विरासत पर मंथन किया जा रहा है।

शिक्षाविदों और संगठनात्मक नेतृत्व की गरिमामयी उपस्थिति

सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में असम के विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुलपति, वरिष्ठ शिक्षाविद और कई प्रमुख संगठनात्मक पदाधिकारी उपस्थित रहे। प्रमुख अतिथियों में अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के राष्ट्रीय संगठन सचिव डॉ. बालमुकुंद पांडेय, राष्ट्रीय संगठन सचिव हेमंत ढींग मजूमदार, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ असम प्रांत के प्रांत प्रचारक नृपेन बर्मन, बीएचआईएस असम के प्रांत अध्यक्ष डॉ. गजेंद्र अधिकारी तथा दक्षिण कामरूप कॉलेज के प्राचार्य डॉ. नबा ज्योति दास दंगोरिया शामिल रहे।

प्राचीन कामरूप की गौरवशाली परंपरा पर प्रकाश

उद्घाटन भाषण में असम भाजपा प्रदेश अध्यक्ष दिलीप सैकिया ने प्राचीन प्राग्ज्योतिषपुर और कामरूप की गौरवशाली विरासत को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि “सबका साथ, सबका विश्वास, सबका प्रयास” के मूलमंत्र के साथ भारत को अपनी सभ्यतागत पहचान और ज्ञान परंपरा को पुनः स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ना होगा। उन्होंने इतिहासकारों और समाज के सभी वर्गों से इस दायित्व में सक्रिय योगदान का आह्वान किया।

औपनिवेशिक और वामपंथी इतिहास लेखन पर सवाल

मुख्य वक्तव्य में डॉ. बालमुकुंद पांडेय ने भारतीय इतिहास लेखन में औपनिवेशिक और वामपंथी दृष्टिकोण से हुई विकृतियों पर गंभीर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि कुछ इतिहासकारों द्वारा बाबर जैसे अल्पकालिक शासनों पर अत्यधिक जोर दिया गया, जबकि 700 वर्षों तक चले अहोम वंश और लगभग 200 वर्षों के गुप्त साम्राज्य जैसे दीर्घकालिक और सशक्त साम्राज्यों की उपेक्षा की गई। उनके अनुसार, इस चयनात्मक इतिहास लेखन से भारत की ऐतिहासिक निरंतरता और सांस्कृतिक गहराई को नुकसान पहुँचा।

असम के नायकों को राष्ट्रीय पहचान दिलाने की जरूरत

डॉ. पांडेय ने यह भी कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रयासों से असम के महान व्यक्तित्वों को राष्ट्रीय पहचान मिली। उन्होंने महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव, लचित बोरफुकन और वीरांगना मुला गभारू जैसी विभूतियों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन्हें देश की मुख्यधारा की ऐतिहासिक चेतना में और अधिक मजबूती से स्थापित किया जाना आवश्यक है।

राष्ट्रीय संगोष्ठी और शोध प्रस्तुतियाँ

प्रांतीय सम्मेलन के साथ-साथ भारतीय ज्ञान परंपरा, इतिहास और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 पर आधारित एक राष्ट्रीय स्तरीय संगोष्ठी भी आयोजित की जा रही है। इसमें असम सहित देश के विभिन्न हिस्सों से आए लगभग 30 शोधकर्ता अपने शोध पत्र प्रस्तुत कर रहे हैं। यह पहल भारतीय इतिहास को औपनिवेशिक प्रभाव से मुक्त करने की दिशा में बढ़ती अकादमिक रुचि को दर्शाती है।

 

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