150 मीटर आसमान में जाकर टैंक का खेल खत्म: कितना घातक है जैवलिन मिसाइल सिस्टम, जमीनी जंग में कैसे बढ़ेगी भारत की ताकत? Javelin Missile System India

आधुनिक युद्धक्षेत्र में बख्तरबंद टैंकों और भारी लड़ाकू वाहनों का मुकाबला करने के लिए अमेरिका द्वारा निर्मित एफजीएम-148 जैवलिन (FGM-148 Javelin) दुनिया का सबसे घातक और सटीक एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल (ATGM) सिस्टम माना जाता है। इसे लॉकहीड मार्टिन (Lockheed Martin) और आरटीएक्स/रेथियॉन (Raytheon) के संयुक्त उपक्रम द्वारा तैयार किया गया है। इराक, अफगानिस्तान और हालिया रूस-यूक्रेन युद्ध में जैवलिन ने बड़े से बड़े आधुनिक टैंकों को नष्ट करके अपनी मारक क्षमता का लोहा मनवाया है। भारत द्वारा इसे अपनी सेना के शस्त्रागार में शामिल करने और को-प्रोडक्शन (सह-उत्पादन) की दिशा में कदम बढ़ाने से वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) और नियंत्रण रेखा (LoC) पर भारतीय इन्फैंट्री (पैदल सेना) की शक्ति कई गुना बढ़ जाएगी।

जैवलिन की सबसे खौफनाक और अचूक ताकत इसका टॉप-अटैक (Top Attack) मोड है। दुनिया के अधिकांश आधुनिक मेन बैटल टैंक (जैसे टी-90, टी-72 या चीन के टाइप-99) के सामने और किनारों पर बेहद मजबूत विस्फोटक प्रतिक्रियाशील कवच (Reactive Armor) लगा होता है। लेकिन टैंक की छत (Turret/Roof) सबसे पतली और कमजोर हिस्सा होती है। जब जैवलिन को लॉन्च किया जाता है, तो यह सीधा निशाने पर जाने के बजाय पहले तेजी से हवा में लगभग 150 मीटर (490 फीट) की ऊंचाई तक जाती है। इसके बाद यह करीब 90 डिग्री के कोण पर नीचे गोता लगाते हुए सीधे टैंक की कमजोर छत पर वार करती है। इसके टेंडेम-चार्ज वॉरहेड (Tandem HEAT Warhead) के आगे दुनिया का कोई भी टैंक टिक नहीं पाता और चंद सेकंड में मलबे में तब्दील हो जाता है।

पारंपरिक एंटी-टैंक मिसाइलों में सैनिक को मिसाइल के निशाने पर पहुंचने तक लेजर या तार के जरिए गाइड करना पड़ता था, जिससे सैनिक दुश्मन के जवाबी हमले (Counterfire) के खतरे में रहता था। जैवलिन पूरी तरह से ‘फायर एंड फॉरगेट’ (Fire-and-Forget) तकनीक पर काम करती है। सैनिक केवल कमांड लॉन्च यूनिट (CLU) में लगे इंफ्रारेड सीकर के जरिए लक्ष्य को लॉक करता है और ट्रिगर दबा देता है। मिसाइल छूटते ही सैनिक अपनी लोकेशन बदल सकता है या छिप सकता है। मिसाइल में लगा थर्मल इमेजिंग और इंफ्रारेड सीकर अपने आप टारगेट को ट्रैक करता है, चाहे टैंक गतिशील हो, धुआं हो या रात का अंधेरा हो।

जैवलिन को ‘मैन-पोर्टेबल’ बनाया गया है, यानी इसे 1 या 2 सैनिक आसानी से अपने कंधे पर उठाकर ऊबड़-खाबड़ रास्तों, घने जंगलों या ऊंचे पहाड़ों पर ले जा सकते हैं। पूरे सिस्टम (लॉन्चर और मिसाइल) का कुल वजन लगभग 22 किलोग्राम होता है। इसके अलावा इसमें ‘सॉफ्ट-लॉन्च’ (Soft-Launch) तकनीक दी गई है। मिसाइल ट्यूब से बाहर निकलते समय बहुत कम धुआं और बैकब्लास्ट छोड़ती है, और जब मिसाइल सुरक्षित दूरी पर पहुंच जाती है, तब उसका मुख्य रॉकेट मोटर चालू होता है। इस वजह से सैनिक इसे किसी बंद कमरे, बंकर या इमारत के अंदर से भी सुरक्षित रूप से फायर कर सकते हैं।

भारत की उत्तरी सीमाएं ऊंचे और दुर्गम हिमालयी इलाकों में स्थित हैं, जहां भारी तोपखाने और बख्तरबंद गाड़ियां ले जाना एक बड़ी चुनौती होती है। लद्दाख, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश जैसे क्षेत्रों में चीनी सेना (PLA) के हल्के और मध्यम टैंकों के खतरे से निपटने के लिए जैवलिन सबसे मुफीद हथियार साबित होगा। 2.5 से 4 किलोमीटर तक की प्रभावी रेंज में यह मिसाइल न केवल टैंकों, बल्कि दुश्मन के मजबूत कंक्रीट बंकरों, स्नाइपर पोस्ट और कम ऊंचाई पर उड़ने वाले हेलिकॉप्टरों को भी पलक झपकते ही तबाह करने में सक्षम है।

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