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पूनम शर्मा
युद्धविराम एवं शर्तें
ईरान और अमरीका के मध्य युद्धविराम भी चल रहा है और युद्ध भी चल रहा है क्या अजीबोगरीब स्थिति है । अभी हाल ही जो युद्धविराम पर ईरान ने तीन शर्तें रखी हैं यह जो एक नया प्रतिवेदन आया है कि जो एक जटिल परिस्थिति की ओर इशारा है । ईरान को लेबनान की तरफदारी करते हुए अपनी शर्तों को आगे बढ़ाना एक ऐसा संकेत है जो अमरीका और ईरान की शांतिवार्ता को एक असमंजस में डालती है ।अमरीका का पाकिस्तान शांतिवार्ता के संदर्भ में किया गया भरोसा ईरान को स्वीकार्य नहीं हो रहा है । ईरान ने अपनी शर्तों में सर्वप्रथम यही उल्लेख किया है कि लेबनान में हमले बंद किए जाएँ । यदि यह स्वीकार्य है तभी होरमुज खुलेगा ईरान भी खोल देगा और अमरीका भी अपनी ओर से खोल सकता है । इस शर्त के पश्चात ही परमाणु वाले मामले पर कोई वार्ता संभव है ।
यह बड़ी ही ऊहापोह वाली स्थिति है वह इसलिए क्योंकि ईरान में बात करने के लिए कोई निश्चित नेतृत्व नहीं है। इस बात को अमरीका कह रहा है।और यह सही भी है ईरान में जो नेतृत्व का संकट है उसके अनुसार एक निर्णय लेने के लिए किसी एक नेता का अभाव एक सोचने वाली बात है ।
पाकिस्तान की मध्यस्थता
अब इससे भी संकटपूर्ण बात यह है कि ईरान पाकिस्तान की मध्यस्थता से असन्तुष्ट है । ईरान का कहना है कि पाकिस्तान का अपना कोई मत नहीं है वह मात्र अमरीका के इशारों पर कार्य कर रहा है । पाकिस्तान की मध्यस्थता को ईरान के लोग स्वीकार नहीं कर पा रहे है और अमरीका अपने एक अजेंडे पर कार्य कर रहा है ।
ईरान के लोग पाकिस्तान की मध्यस्थता नहीं स्वीकार करेंगे, क्योंकि पाकिस्तान का झुकाव अमेरिका की तरफ ज्यादा है। ईरानी पक्ष का मानना है कि पाकिस्तान स्वतंत्र रूप से निर्णय नहीं ले सकता, क्योंकि पाकिस्तान अमेरिका की बात नहीं मानेगा तो उसे IMF या एशियन डेवलपमेंट बैंक से आर्थिक मदद मिलना मुश्किल हो जाएगा। ऐसे में पाकिस्तान को अपने देश की अर्थव्यवस्था को चलाने में भी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भी पाकिस्तान को कई बार अपनी नीतियों में तरजीह दी थी। वहीं, इजराइल लेबनान के अंदर तक पहुँच बना चुका है, और पाकिस्तान के लिए लेबनान जैसे मामलों में हस्तक्षेप करना या कूटनीतिक दखल देना संभव नहीं है, क्योंकि पाकिस्तान के पास इस क्षेत्र में अनुभव और सामर्थ्य की कमी है। इसलिए, मध्यस्थता के लिए कतर या ओमान जैसे देशों को चुना जाना चाहिए, जिनकी क्षेत्र में साख और कूटनीतिक अनुभव अधिक है। डॉन अखबार ने भी अपने लेख में इसी तरह का विचार दिया है।
इसलिए, यह सुझाव दिया जा रहा है कि मध्यस्थता के लिए कतर या ओमान जैसे देशों को चुना जाना चाहिए, जिनकी क्षेत्र में साख और कूटनीतिक अनुभव अधिक है। डॉन अख़बार ने भी अपने लेख में इसी तरह का विचार प्रस्तुत किया है।
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