जब भी भारत में मानसून की बात होती है, तो एक शब्द अक्सर सुर्खियों में आ जाता है—'एल नीनो' (El Nino)। प्रशांत महासागर में होने वाली इस हलचल का भारतीय मानसून पर सीधा असर पड़ता है, यह बात आज पूरी दुनिया जानती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि दुनिया को एल नीनो और मानसून के इस गहरे और अनोखे संबंध को समझाने वाला कोई और नहीं, बल्कि खुद भारत था? आज से करीब 100 साल पहले भारत की धरती पर एक ऐसी ऐतिहासिक वैज्ञानिक खोज हुई थी, जिसने न सिर्फ दुनिया भर के मौसम वैज्ञानिकों की सोच को बदल दिया, बल्कि मानसून की भविष्यवाणी करने के पूरे विज्ञान में एक युगांतरकारी क्रांति ला दी।
सर गिल्बर्ट वॉकर और शिमला मौसम विभाग की वो ऐतिहासिक रिसर्च
इस कहानी की शुरुआत होती है साल 1904 में, जब ब्रिटिश गणितज्ञ और वैज्ञानिक सर गिल्बर्ट वॉकर को भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) का महानिदेशक नियुक्त किया गया। उस दौर में भारत बार-बार पड़ने वाले भीषण सूखे और अकाल से जूझ रहा था, जिससे करोड़ों जिंदगियां दांव पर लगी थीं। वॉकर ने शिमला के मौसम कार्यालय में बैठकर दशकों पुराने मौसम के आंकड़ों का बारीकी से अध्ययन करना शुरू किया। उनका मानना था कि भारतीय मानसून का संबंध सिर्फ स्थानीय हवाओं से नहीं है, बल्कि इसके पीछे कोई वैश्विक मौसमी चक्र काम कर रहा है। सालों की कड़ी मेहनत के बाद उन्होंने पाया कि जब भी प्रशांत महासागर के वायुमंडलीय दबाव में बदलाव आता है, तो उसका सीधा असर हिंद महासागर और भारत के मानसून पर पड़ता है। उन्होंने इस बड़े मौसमी उतार-चढ़ाव को 'सदर्न ऑसिलेशन' (Southern Oscillation) का नाम दिया।
जब प्रशांत महासागर की हलचल से जुड़ा भारतीय मानसून का भाग्य
सर गिल्बर्ट वॉकर की इस अभूतपूर्व खोज के कई दशकों बाद वैज्ञानिकों को समझ आया कि वॉकर का 'सदर्न ऑसिलेशन' और समुद्र के गर्म होने की घटना 'एल नीनो' असल में एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, जिसे आज सामूहिक रूप से 'इंसो' (ENSO – El Nino Southern Oscillation) कहा जाता है। भारतीय मौसम विभाग के उस ऐतिहासिक दफ्तर से निकले निष्कर्षों ने पहली बार यह साबित किया कि कैसे हजारों मील दूर बैठे प्रशांत महासागर की गर्म जलधाराएं भारत के करोड़ों किसानों की किस्मत तय करती हैं। इस खोज से पहले तक दुनिया भर के मौसम विज्ञानी केवल स्थानीय बादलों और हवा के दबाव के आधार पर ही बारिश का अनुमान लगाते थे, लेकिन इस भारतीय खोज ने उन्हें पूरी पृथ्वी के मौसम को एक इंटरकनेक्टेड सिस्टम के रूप में देखने पर मजबूर कर दिया।
आज भी प्रासंगिक है 100 साल पुराना वो भारतीय फॉर्मूला
आज के इस आधुनिक और डिजिटल युग में भले ही हमारे पास सुपर कंप्यूटर और एडवांस सैटेलाइट मौजूद हैं, लेकिन मानसून की सटीक भविष्यवाणी के लिए आज भी आधार उसी 100 साल पुरानी भारतीय खोज को ही बनाया जाता है। एल नीनो का असर सिर्फ भारत पर ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की खेती, अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा पर पड़ता है। भारत की इस महान वैज्ञानिक विरासत ने वैश्विक स्तर पर मौसम विज्ञान की नींव को मजबूत किया। यही वजह है कि आज जब भी दुनिया के बड़े वैज्ञानिक अल नीनो और ग्लोबल वार्मिंग के खतरों पर चर्चा करते हैं, तो वे भारत के इस गौरवशाली और ऐतिहासिक योगदान को सलाम करना नहीं भूलते।
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