पैसे नहीं हैं तो प्लास्टिक लाओ और पढ़ाई करो: असम के 'अक्षर स्कूल' ने फीस के अनोखे मॉडल से शिक्षा और पर्यावरण में रचा इतिहास

भारत के पूर्वोत्तर राज्य असम के गुवाहाटी स्थित पमोही गांव में एक ऐसा अनोखा स्कूल चल रहा है, जिसने देश भर में शिक्षा और पर्यावरण संरक्षण की परिभाषा ही बदल कर रख दी है। जहां प्राइवेट स्कूलों में महंगी फीस, डोनेशन और किताबों का भारी खर्च गरीब परिवारों के बच्चों को पढ़ाई से दूर कर देता है, वहीं 'अक्षर स्कूल' (Akshar School) ने एक क्रांतिकारी नियम बनाया है—"यदि आपके पास फीस देने के लिए पैसे नहीं हैं, तो कोई बात नहीं; बस घर और आस-पास से प्लास्टिक का सूखा कचरा लेकर आएं और मुफ्त में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पाएं।" इस अनूठी पहल ने न केवल सैकड़ों गरीब बच्चों को बाल मजदूरी के दलदल से निकालकर स्कूल की चौखट तक पहुंचाया है, बल्कि इलाके को जहरीले प्लास्टिक कचरे और प्रदूषण से भी मुक्ति दिलाई है।

माजिन मुख्तार और परमिता शर्मा की दूरदर्शी सोच से हुई शुरुआत

इस प्रेरणादायक स्कूल की नींव साल 2016 में माजिन मुख्तार (Mazin Mukhtar) और उनकी पत्नी परमिता शर्मा (Parmita Sarma) ने 'अक्षर फाउंडेशन' के तहत रखी थी। जब वे दोनों पमोही गांव पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि वहां के ज्यादातर बच्चे पास की पत्थर खदानों (Stone Quarries) में दिन भर मजदूरी करते थे ताकि परिवार के लिए ₹150-₹200 कमा सकें।

इसके साथ ही गांव में प्लास्टिक कचरा जलाने की बेहद खतरनाक प्रथा थी। लोग सर्दियों में ठंड से बचने या कचरा ठिकाने लगाने के लिए प्लास्टिक की थैलियों और बोतलों को जलाते थे, जिससे उठने वाले जहरीले धुएं से बच्चे और बुजुर्ग फेफड़ों की गंभीर बीमारियों से जूझ रहे थे। इस दोहरी समस्या—बाल मजदूरी और प्लास्टिक प्रदूषण—को एक साथ खत्म करने के लिए उन्होंने 'प्लास्टिक फीस' का विचार विकसित किया।

हर हफ्ते 20 से 25 पीस प्लास्टिक कचरा है स्कूल की 'ट्यूशन फीस'

अक्षर स्कूल में दाखिला लेने वाले हर छात्र के लिए एक ही अनिवार्य नियम है कि उसे हर सप्ताह अपने घर, पड़ोस या रास्तों से कम से कम 20 से 25 सूखे प्लास्टिक के रैपर, पैकेट या बोतलें जमा करके स्कूल लानी होती हैं।

माता-पिता का संकल्प: दाखिले के समय माता-पिता से यह लिखित वादा लिया जाता है कि वे घर का प्लास्टिक कचरा कभी नहीं जलाएंगे और उसे अपने बच्चों के जरिए स्कूल भेजेंगे।

प्रदूषण पर रोक: इस नियम के चलते गांव के सैकड़ों परिवारों ने प्लास्टिक कचरा जलाना पूरी तरह बंद कर दिया और पूरा इलाका साफ-सुथरा व हरा-भरा नजर आने लगा।

प्लास्टिक कचरे से बनती हैं 'इको-ब्रिक्स' और निर्माण सामग्री

स्कूल में इकट्ठा होने वाले प्लास्टिक के कचरे को यूं ही फेंका नहीं जाता, बल्कि बच्चे और शिक्षक मिलकर इसका वैज्ञानिक रीसाइक्लिंग करते हैं:

इको-ब्रिक्स (Eco-Bricks): छात्र खाली प्लास्टिक की बोतलों में पॉलीथिन और सिंगल-यूज प्लास्टिक रैपर्स को कसकर ठूंसते हैं, जिससे मजबूत और ठोस 'इको-ब्रिक' तैयार होती है।

स्कूल में निर्माण कार्य: इन इको-ब्रिक्स और सीमेंट के मिश्रण से स्कूल परिसर में बैठने के चबूतरे, बाउंड्री वॉल, पौधों के गमले और पक्के रास्ते बनाए गए हैं।

रीसाइक्लिंग यूनिट: बचे हुए प्लास्टिक को आगे रीसाइक्लिंग प्लांट में भेजा जाता है, जिससे खिलौने और उपयोगी वस्तुएं बनती हैं।

'पीयर-टू-पीयर' लर्निंग और वोकेशनल कमाई का मॉडल

अक्षर स्कूल का पाठ्यक्रम केवल पारंपरिक किताबों (गणित, विज्ञान, अंग्रेजी) तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने पर केंद्रित है:

सीखो और कमाओ (Learn and Earn): स्कूल में बड़े और वरिष्ठ छात्र छोटे बच्चों को पढ़ाते हैं। इसके बदले में बड़े छात्रों को टॉय-करेंसी (Toy Currency) या मानदेय मिलता है, जिसे वे स्टेशनरी, कपड़े, जूते या खाने के सामान में बदल सकते हैं। इससे उन्हें पत्थर खदानों में मजदूरी करने की जरूरत नहीं पड़ती।

व्यावहारिक कौशल (Skill Training): स्कूल में छात्रों को सोलर पैनल इंस्टॉलेशन, कारपेंट्री, ऑर्गेनिक फार्मिंग, पशु देखभाल, कोडिंग और सिलाई-कढ़ाई का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाता है, ताकि 16-17 साल की उम्र तक पहुंचते ही वे एक आत्मनिर्भर करियर चुन सकें।

असम के पमोही गांव से शुरू हुआ यह मॉडल आज संयुक्त राष्ट्र (UN) और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सराहा जा रहा है। अक्षर स्कूल ने साबित कर दिखाया है कि अगर सोच में नवाचार और समाज के प्रति सच्ची निष्ठा हो, तो कचरे को भी शिक्षा की ताकत में बदलकर एक नई पीढ़ी का भविष्य संवारा जा सकता है।

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