तलवार के जोर पर नहीं, शांतिपूर्ण व्यापार से भारत आया इस्लाम ,शशि थरूर ने छिड़ी नई बहस, इतिहास का दिया हवाला

News India Live, Digital Desk: कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और तिरुवनंतपुरम से सांसद शशि थरूर अपने बेबाक बयानों और ऐतिहासिक संदर्भों के लिए जाने जाते हैं। हाल ही में एक कार्यक्रम के दौरान थरूर ने भारत में इस्लाम के आगमन और उसके प्रसार को लेकर एक बड़ा बयान दिया है, जिसने सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक चर्चा छेड़ दी है। थरूर का कहना है कि भारत में इस्लाम का प्रवेश किसी सैन्य विजय या तलवार के बल पर नहीं, बल्कि समुद्री व्यापार और शांतिपूर्ण आदान-प्रदान के जरिए हुआ था।

केरल के तट और अरब व्यापारियों का जिक्र

शशि थरूर ने अपने तर्क को पुख्ता करने के लिए दक्षिण भारत, विशेषकर केरल के इतिहास का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि इस्लाम भारत के मालाबार तट पर 7वीं शताब्दी में ही पहुंच गया था। यह वह समय था जब अरब व्यापारी मसालों के व्यापार के लिए केरल आया करते थे। इन व्यापारियों के साथ उनके विचार, संस्कृति और धर्म भी आए। थरूर के मुताबिक, स्थानीय राजाओं और जनता ने इन व्यापारियों का स्वागत किया, जिससे इस्लाम को फलने-फूलने के लिए एक सौहार्दपूर्ण वातावरण मिला।

‘विजय की तलवार’ बनाम ‘शांति का मार्ग’

अक्सर इतिहास की किताबों और विमर्श में यह तर्क दिया जाता है कि मध्य काल में आक्रमणकारियों ने भारत में इस्लाम का प्रसार जबरन किया। हालांकि, शशि थरूर ने इस धारणा को चुनौती देते हुए कहा कि उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में सैन्य अभियानों का इतिहास हो सकता है, लेकिन पूरे भारत के संदर्भ में यह कहना गलत होगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत का एक बड़ा हिस्सा ऐसा है जहां इस्लाम आपसी समझ, व्यापारिक संबंधों और सूफी संतों के प्रेमपूर्ण संदेशों के कारण फैला, न कि किसी युद्ध की वजह से।

चेरामन जुमा मस्जिद का ऐतिहासिक महत्व

अपने संबोधन में थरूर ने केरल की प्रसिद्ध चेरामन जुमा मस्जिद का भी जिक्र किया, जिसे भारत की पहली मस्जिद माना जाता है। उन्होंने बताया कि इस मस्जिद का निर्माण किसी आक्रमण के बाद नहीं, बल्कि एक स्थानीय हिंदू राजा के सहयोग से हुआ था। यह इस बात का जीवित प्रमाण है कि भारत में धर्मों का सह-अस्तित्व और सम्मान हमेशा से रहा है। थरूर ने कहा कि इतिहास को केवल युद्धों के नजरिए से देखना गलत है, हमें सांस्कृतिक आदान-प्रदान के पहलुओं को भी समझना होगा।

ध्रुवीकरण की राजनीति पर थरूर का निशाना

शशि थरूर का यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश में इतिहास के पुनर्लेखन और धार्मिक पहचान को लेकर बहस तेज है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि थरूर इस तरह के बयानों के जरिए उस ‘साझा संस्कृति’ (Ganga-Jamuni Tehzeeb) की याद दिलाना चाहते हैं, जो भारत की असली पहचान रही है। उनके इस बयान पर जहां एक पक्ष उनकी ऐतिहासिक समझ की तारीफ कर रहा है, वहीं दूसरा पक्ष इसे एकतरफा नजरिया बताकर सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया दे रहा है।

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