कौन हैं ऋतब्रत बनर्जी? पश्चिम बंगाल में TMC की ऐतिहासिक टूट और बगावत का चेहरा बने इस नेता की पूरी कहानी
पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस समय एक ऐसा ऐतिहासिक उलटफेर देखने को मिल रहा है जिसकी कल्पना शायद कुछ समय पहले तक किसी ने नहीं की थी। लोकसभा चुनाव में करारी हार का सामना करने के महज एक महीने बाद ही ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) गहरे आंतरिक संकट में घिर गई है। पार्टी के 28 साल के इतिहास में पहली बार औपचारिक तौर पर इतनी बड़ी टूट सामने आई है, जिसने राज्य के सियासी समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया है।
इस बगावत के केंद्र में हैं ऋतब्रत बनर्जी (Ritabrata Banerjee)। बुधवार, 3 जून 2026 को टीएमसी के 58 बागी विधायकों ने सर्वसम्मति से ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता चुन लिया। इसके तुरंत बाद विधानसभा स्पीकर रथींद्र बसु को इन विधायकों का समर्थन पत्र सौंपा गया, जिसे स्पीकर ने स्वीकार कर लिया। इसके साथ ही ऋतब्रत बनर्जी को पश्चिम बंगाल विधानसभा में ‘नेता प्रतिपक्ष’ (Leader of Opposition) के रूप में आधिकारिक मान्यता मिल गई है और उन्हें विपक्ष के नेता के लिए आवंटित कक्ष की चाबी भी सौंप दी गई है।
58 बनाम 22: आंकड़ों में समझिए दीदी की कम होती ताकत
ममता बनर्जी ने 28 साल पहले जब टीएमसी का गठन किया था, तब से लेकर आज तक पार्टी के तमाम बड़े फैसले वे खुद ही लेती रही हैं। यह पहली बार है जब किसी दूसरी पार्टी से आए नेता ने टीएमसी से निष्कासित होने के बाद उसके दो-तिहाई से ज्यादा विधायकों को अपने खेमे में कर लिया है।
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कुल सीटें: हालिया चुनावों में टीएमसी ने 294 सीटों में से 80 सीटों पर जीत हासिल की थी।
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बागी गुट: 80 में से 58 विधायकों ने ममता बनर्जी का साथ छोड़कर ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता चुना है। यह संख्या दो-तिहाई से ज्यादा है, जिसकी वजह से दल-बदल कानून के तहत इन विधायकों की सदस्यता पर भी कोई खतरा नहीं है।
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ममता बनर्जी के पास: अब ममता बनर्जी के खेमे में महज 22 विधायक ही बचे हैं।
छात्र राजनीति से नेता प्रतिपक्ष तक: ऋतब्रत बनर्जी का राजनीतिक सफर
ऋतब्रत बनर्जी का जन्म 15 नवंबर 1979 को कोलकाता में हुआ था। उन्होंने कोलकाता के साउथ पॉइंट हाई स्कूल से अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की। इसके बाद उन्होंने आशुतोष कॉलेज से स्नातक (Graduation) और कलकत्ता विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में पोस्ट ग्रेजुएशन (MA in English) की डिग्री हासिल की। वे पढ़ाई के दिनों से ही छात्र राजनीति में बेहद सक्रिय हो गए थे।
उनका अब तक का राजनीतिक सफर उतार-चढ़ाव से भरा रहा है, जिसे क्रोनोलॉजिकल ऑर्डर में नीचे देखा जा सकता है:
छात्र राजनीति में बड़ी पहचान
साल 2008
वामपंथी छात्र संगठन स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) में सक्रिय रहते हुए ऋतब्रत इसके अखिल भारतीय महासचिव बने। वे साल 2016 तक इस पद पर रहे और युवाओं के बीच एक मजबूत पकड़ बनाई।
पहली बार राज्यसभा का सफर
साल 2014
माकपा (CPI-M) ने उनकी काबिलियत को देखते हुए उन्हें राज्यसभा भेजा। उन्हें पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य का बेहद करीबी और वामपंथ का उभरता हुआ युवा चेहरा माना जाता था।
पार्टी से निष्कासन
साल 2017
पार्टी के भीतर कुछ वैचारिक मतभेदों और अनुशासनहीनता के आरोपों के बाद माकपा (CPI-M) ने उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया।
तृणमूल कांग्रेस (TMC) में एंट्री
साल 2020
कम्युनिस्ट राजनीति को पीछे छोड़ते हुए ऋतब्रत बनर्जी ने ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी का दामन थाम लिया और पार्टी के भीतर अपनी संगठनात्मक क्षमता को साबित किया।
दूसरी बार संसद और विधानसभा में जीत
साल 2024 – 2026
साल 2024 में वे टीएमसी के टिकट पर दूसरी बार राज्यसभा पहुंचे। इसके बाद साल 2026 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने उलूबेरिया पूर्व (Uluberia Purba) सीट से चुनाव लड़ा और शानदार जीत दर्ज कर विधानसभा पहुंचे।
TMC में बगावत और ऐतिहासिक पद
जून 2026
टीएमसी के भीतर नेता विपक्ष के चुनाव को लेकर हुए विवाद के बाद ऋतब्रत को पार्टी से निकाल दिया गया। इसके जवाब में उन्होंने 58 विधायकों को एकजुट कर इतिहास रच दिया और अब पश्चिम बंगाल के नए नेता प्रतिपक्ष बन गए हैं।
आखिर कहाँ से शुरू हुआ यह पूरा विवाद?
विवाद की मुख्य वजह:
इस पूरे सियासी घमासान की शुरुआत उस समय हुई जब पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता विपक्ष चुनने का प्रस्ताव आया था। इस प्रक्रिया के दौरान ऋतब्रत बनर्जी और उनके साथी संदीपन साहा पर पार्टी के भीतर ‘फर्जी हस्ताक्षर’ (Forged Signatures) करने के गंभीर आरोप लगाए गए। इन आरोपों के तुरंत बाद टीएमसी नेतृत्व ने बिना किसी बड़ी जांच के ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को पार्टी से निष्कासित कर दिया।
पार्टी का यह फैसला ममता बनर्जी के लिए आत्मघाती साबित हुआ। निष्कासन के बाद ऋतब्रत ने चुप बैठने के बजाय पार्टी के असंतुष्ट विधायकों से संपर्क साधा। चूंकि लोकसभा चुनाव में हार के बाद से ही कई विधायक पार्टी नेतृत्व से नाराज चल रहे थे, इसलिए ऋतब्रत को उन्हें अपने पाले में लाने में ज्यादा वक्त नहीं लगा। नतीजा आज सबके सामने है— टीएमसी दो फाड़ हो चुकी है और पश्चिम बंगाल की राजनीति एक नए और अनिश्चित दौर में प्रवेश कर चुकी है।
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