कांग्रेस के लिए ‘संकट काल’: 3 बड़े मुद्दों पर घिरी पार्टी, राहुल गांधी के विदेश दौरों का सियासी नुकसान A ‘time of crisis’ for the Congress: Party cornered on three major issues; political fallout from Rahul Gandhi’s foreign visits.
आगामी चुनावों की आहट के बीच कांग्रेस पार्टी एक बार फिर गहरे सियासी भंवर में फंसी नजर आ रही है। हालिया घटनाक्रमों और राजनीतिक विश्लेषणों की मानें तो पार्टी के सामने तीन बड़े मुद्दे—नेतृत्व की सक्रियता, संगठन में समन्वय की कमी और जनता के बीच बढ़ती दूरी—बड़ी बाधा बनकर उभरे हैं। पार्टी के रणनीतिकार और जमीनी कार्यकर्ता इस बात से खासे परेशान हैं कि महत्वपूर्ण राजनीतिक दौरों के दौरान राहुल गांधी की विदेश यात्राओं ने पार्टी के नैरेटिव को कमजोर कर दिया है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इन दौरों की भारी कीमत कांग्रेस को चुनावी नतीजों और जनसमर्थन के रूप में चुकानी पड़ रही है।
आखिर क्यों खाली हाथ रह गई कांग्रेस?
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जब देश में महंगाई, बेरोजगारी और स्थानीय शासन जैसे बड़े मुद्दों पर विपक्ष को आक्रामक रुख अपनाकर सरकार को घेरना चाहिए था, तब पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का नदारद होना कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़ने का काम कर रहा है। कांग्रेस के अंदरखाने भी इस बात की चर्चा है कि ‘वैक्यूम’ की स्थिति ने विपक्षी स्पेस को पूरी तरह खाली छोड़ दिया है, जिसे अन्य क्षेत्रीय दल भरने की कोशिश कर रहे हैं। कांग्रेस जिस तरह से इन मुद्दों को भुनाने में नाकाम रही, उसने एक बार फिर संगठन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
नेतृत्व और सक्रियता का बड़ा संकट
किसी भी चुनाव में नेतृत्व की मौजूदगी सबसे महत्वपूर्ण होती है। ऐसे समय में जब जनता सड़क पर है और कई महत्वपूर्ण मसले सरकार के खिलाफ जा रहे हैं, राहुल गांधी का विदेश दौरा पार्टी की प्राथमिकता को लेकर संदेह पैदा करता है। यही कारण है कि पार्टी के सीनियर नेता और समर्थक भी असमंजस में हैं। जनता के बीच यह संदेश जा रहा है कि पार्टी गंभीर मुद्दों पर संघर्ष करने के बजाय ‘ऑप्शनल पॉलिटिक्स’ कर रही है। कांग्रेस की यह विफलता अब पार्टी के लिए एक अस्तित्व का सवाल बनती जा रही है, क्योंकि लगातार चुनावी हार के बाद भी पार्टी अपनी कार्यशैली में अपेक्षित सुधार नहीं ला पाई है।
क्या अब भी संभलने का है मौका?
सवाल यह है कि क्या कांग्रेस अपनी इन गलतियों से सबक लेगी? यदि पार्टी को अपनी खोई हुई साख वापस लानी है, तो उसे अपनी प्राथमिकताएं फिर से तय करनी होंगी। जमीनी स्तर पर पकड़ मजबूत करना और नेतृत्व का हरदम सक्रिय रहना ही एकमात्र रास्ता बचा है। यदि पार्टी ने इसी तरह से महत्वपूर्ण मौकों पर अपने नेतृत्व की अनुपस्थिति के कारण मुद्दों को हाथ से फिसलने दिया, तो आने वाले समय में कांग्रेस के लिए और भी मुश्किलें बढ़ सकती हैं। अब देखना यह है कि क्या आने वाले दिनों में कांग्रेस अपने संगठन को फिर से चुस्त-दुरुस्त कर पाती है या फिर वह इन्ही पुराने चक्रव्यूह में फंसकर रह जाएगी।
Comments are closed.