सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला बाबरी मस्जिद विध्वंस पर अब नहीं होगी कोई सुनवाई याचिका खारिज

News India Live, Digital Desk : जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस बी.वी. नागरत्ना की पीठ ने उस याचिका को सुनने से मना कर दिया जिसमें 6 दिसंबर 1992 की घटना पर रोक लगाने या उससे जुड़े कानूनी पहलुओं को दोबारा खोलने की मांग की गई थी।

अदालत की मुख्य टिप्पणियां (Key Highlights of the Hearing)

मामला पूरी तरह खत्म: पीठ ने कहा कि बाबरी मस्जिद विध्वंस और उससे जुड़े आपराधिक मामलों पर पहले ही निचली अदालतों और हाईकोर्ट के फैसले आ चुके हैं। सीबीआई की विशेष अदालत ने 2020 में सभी आरोपियों को बरी कर दिया था, और अब इसे दोबारा खोलना कानून का दुरुपयोग है।

अयोध्या फैसला अंतिम: जजों ने याद दिलाया कि 9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने सर्वसम्मति से अयोध्या जमीन विवाद पर अपना अंतिम फैसला सुना दिया था। अब उस घटनाक्रम से जुड़ी किसी भी नई याचिका का कोई औचित्य नहीं है।

समय की बर्बादी: सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता पर नाराजगी जताते हुए कहा कि ऐसे मामलों को लाकर अदालत का कीमती समय बर्बाद किया जा रहा है, जबकि देश के सामने कई अन्य महत्वपूर्ण मुद्दे लंबित हैं।

नसीहत: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि “इतिहास को अदालती आदेशों के जरिए नहीं बदला जा सकता और न ही गड़े मुर्दे उखाड़ने से सामाजिक सौहार्द बढ़ता है।”

पृष्ठभूमि: बाबरी-अयोध्या कानूनी सफर

वर्ष महत्वपूर्ण घटना
1992 6 दिसंबर को अयोध्या में विवादित ढांचा (बाबरी मस्जिद) ढहाया गया।
2010 इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला (जमीन को तीन हिस्सों में बांटने का आदेश)।
2019 सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: विवादित जमीन रामलला को दी गई, मस्जिद के लिए 5 एकड़ अलग जमीन का आदेश।
2020 सीबीआई कोर्ट ने आडवाणी, जोशी समेत सभी 32 आरोपियों को विध्वंस मामले में बरी किया।
2024 अयोध्या में नवनिर्मित राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा।

याचिका में क्या मांग थी?

याचिकाकर्ता ने अपनी अर्जी में तर्क दिया था कि 1992 की घटना एक “ऐतिहासिक अन्याय” थी और इसकी कानूनी वैधता की फिर से समीक्षा होनी चाहिए। हालांकि, अदालत ने इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया कि यह मामला अब न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के दायरे से बाहर है क्योंकि इस पर अंतिम फैसला (Finality of Judgment) आ चुका है।

Comments are closed.