भारतीय राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर केंद्र सरकार और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के बीच जुबानी जंग और तनातनी तेज हो गई है। कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे (Mallikarjun Kharge) ने देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) को एक बेहद कड़ा पत्र लिखा है। इस चिट्ठी के जरिए खरगे ने संसद के मानसून सत्र के सत्रावसान में हुई असामान्य देरी, नए परिसीमन (Delimitation) के प्रस्तावों और किसी भी संवैधानिक संशोधन विधेयक को संसद में जबरन पारित कराने की कोशिशों को लेकर गंभीर आपत्ति जताई है। विपक्ष के इस आक्रामक रुख के बाद से राष्ट्रीय राजधानी की राजनीति में एक नया भूचाल आ गया है।
मानसून सत्र के सत्रावसान में ‘अभूतपूर्व देरी’ पर उठाए गए सवाल
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री मोदी को लिखे अपने पत्र की शुरुआत संसद के कामकाज और उसके नियमों से जुड़े एक अहम मुद्दे से की है। उन्होंने पत्र में इस बात का जिक्र किया है कि संसद का मानसून सत्र गत 13 अगस्त को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित (Adjourned Sine Die) किया गया था। इस घटना को बीते हुए 64 से अधिक दिन यानी दो महीने से ज्यादा का वक्त बीत चुका है, लेकिन इसके बावजूद अभी तक संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) का आधिकारिक तौर पर सत्रावसान (Prorogation) नहीं किया गया है।
संसदीय इतिहास और परंपराओं का हवाला देते हुए खरगे ने इस अभूतपूर्व देरी पर गहरी चिंता और ऐतराज जताया है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि सत्र के सत्रावसान में इस तरह की लंबी देरी सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा नहीं है, जिसके चलते विपक्ष को सरकार की नीयत पर संदेह हो रहा है। कांग्रेस पार्टी का यह भी आरोप है कि सरकार संसद की लोकतांत्रिक मर्यादाओं को ताक पर रखकर अपने हिसाब से कामकाज चलाना चाहती है।
नए परिसीमन प्रस्तावों पर बुलाई जाए सर्वदलीय बैठक: खरगे
चिट्ठी के सबसे महत्वपूर्ण हिस्सों में से एक देश में होने वाले नए परिसीमन (Delimitation Process) का मुद्दा है। मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आगाह करते हुए मांग की है कि सरकार को नए परिसीमन प्रस्तावों पर आगे बढ़ने से पहले देश के सभी प्रमुख राजनीतिक दलों की एक सर्वदलीय बैठक (All-Party Meeting) बुलानी चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि संसद में किसी भी परिसीमन प्रस्ताव को अंतिम रूप देने या उस पर मुहर लगाने से पहले इस व्यापक विचार-विमर्श की सख्त आवश्यकता है।
खरगे ने स्पष्ट किया कि विपक्ष और देश के तमाम राजनीतिक दल परिसीमन के इस संवेदनशील विषय पर हर पहलू से खुली चर्चा करना चाहते हैं, ताकि राज्यों के प्रतिनिधित्व और संघवाद के ढांचे पर इसका कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। यदि सरकार बिना चर्चा के इस दिशा में कोई कदम उठाती है, तो इसका संसद के भीतर और बाहर कड़ा विरोध किया जाएगा।
संवैधानिक संशोधन बिलों को लेकर सरकार को दी कड़ी चेतावनी
मल्लिकार्जुन खरगे ने अपने पत्र के जरिए मोदी सरकार को इस बात के लिए भी सचेत किया है कि वह संसद में किसी भी प्रकार के संवैधानिक संशोधन विधेयक (Constitutional Amendment Bill) को जबरन या बहुमत के बल पर पारित कराने की कोशिश बिल्कुल न करे। गौरतलब है कि पिछले लोकसभा चुनावों के दौरान भी विपक्ष ने आक्रामक प्रचार करते हुए यह आरोप लगाया था कि भारतीय जनता पार्टी और एनडीए गठबंधन यदि दो-तिहाई बहुमत हासिल कर लेता है, तो वे देश के संविधान में बुनियादी बदलाव कर देंगे।
यद्यपि उस दौरान मोदी सरकार और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने यह पूरी तरह स्पष्ट कर दिया था कि संविधान की मूल भावना से छेड़छाड़ करने या उसे बदलने की किसी को अनुमति नहीं है, लेकिन इसके बावजूद विपक्ष लगातार इस मुद्दे पर सतर्क नजर आ रहा है। खरगे का यह पत्र इस बात का संकेत है कि आने वाले संसद सत्र में संविधान और विधायी सुधारों के मुद्दों पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी भिड़ंत देखने को मिल सकती है।
जयराम रमेश ने सोशल मीडिया पर साझा किया पत्र
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे द्वारा प्रधानमंत्री को लिखे गए इस सनसनीखेज पत्र को पार्टी के वरिष्ठ नेता और महासचिव (संचार) जयराम रमेश (Jairam Ramesh) ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर सार्वजनिक किया। उन्होंने पोस्ट शेयर करते हुए लिखा कि खरगे जी ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर संसद के मानसून सत्र के सत्रावसान में हुई अभूतपूर्व देरी और मोदी सरकार की भविष्य की संभावित विधायी योजनाओं के बारे में कड़े सवाल पूछे हैं।
इस पूरे घटनाक्रम के सामने आने के बाद से राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया है। एक तरफ जहां विपक्ष इसे सरकार की तानाशाही कार्यशैली बता रहा है, वहीं दूसरी तरफ यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इस पत्र का क्या जवाब देती है और आगामी संसद सत्र की कार्रवाई किस दिशा में आगे बढ़ती है।
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