भारत ने बिछाया ऐसा कूटनीतिक जाल कि ड्रैगन रह गया हैरान! ‘चिकन नेक’ का शक्तिशाली तोड़ बना IMT प्रोजेक्ट, जानें कैसे एक ही चाल से सधे 6 बड़े रणनीतिक निशाने

भारत की भौगोलिक और सामरिक सुरक्षा में ‘सिलीगुड़ी कॉरिडोर’ यानी ‘चिकन नेक’ सबसे संवेदनशील हिस्सा माना जाता है। पश्चिम बंगाल में स्थित महज 22 किलोमीटर चौड़ी यह जमीन की पट्टी पूरे पूर्वोत्तर भारत (North-East) को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ती है। चीन की नजर हमेशा इस इलाके पर रही है, क्योंकि युद्ध जैसी किसी भी विषम परिस्थिति में इस एक संकरे रास्ते को काटकर पूर्वोत्तर के आठों राज्यों को देश से अलग-थलग करने की रणनीति पर काम किया जा सकता है।

इसी भू-राजनीतिक कमजोरी को पूरी तरह खत्म करने के लिए भारत ने अपनी ‘ऐक्ट ईस्ट पॉलिसी’ (Act East Policy) के तहत भारत-म्यांमार-थाईलैंड (IMT) ट्राइलेटरल हाईवे प्रोजेक्ट को अमलीजामा पहनाना शुरू किया है। लगभग 1,400 किलोमीटर लंबा यह हाईवे मणिपुर के मोरेह (Moreh) से शुरू होकर म्यांमार के रास्ते थाईलैंड के माई सोत (Mae Sot) शहर तक जाता है। यह केवल एक सड़क परियोजना नहीं है, बल्कि यह चिकन नेक का एक ऐसा शक्तिशाली रणनीतिक और व्यापारिक विकल्प है जो भारत को सीधे दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों (ASEAN) से स्थलीय मार्ग द्वारा जोड़ता है।

निशाना 1: चिकन नेक की रणनीतिक निर्भरता खत्म और वैकल्पिक भूमि मार्ग

IMT प्रोजेक्ट का सबसे बड़ा फायदा भारत को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के मोर्चे पर मिला है। सिलीगुड़ी कॉरिडोर पर किसी भी प्रकार के सैन्य संकट या प्राकृतिक आपदा के समय यह हाईवे भारत के लिए एक गेमचेंजर साबित होगा। यदि कभी चिकन नेक के रास्ते में कोई बाधा आती है, तो भारत म्यांमार और आसियान देशों के रास्ते अपने पूर्वोत्तर राज्यों तक आपूर्ति और रसद आसानी से पहुंचा सकता है। इसके अलावा, भारत का ‘कालादान मल्टी-मॉडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट’ (Kaladan Project) और IMT हाईवे मिलकर एक ऐसा सुरक्षा कवच तैयार करते हैं जो पूर्वोत्तर भारत की मुख्य भूमि से कनेक्टिविटी को हर परिस्थिति में सुरक्षित रखता है।

निशाना 2: पूर्वोत्तर भारत (North-East) की आर्थिक और सामाजिक कायाकल्प

पूर्वोत्तर के आठ राज्य लंबे समय तक भौगोलिक अलगाव और बुनियादी ढांचे की कमी के कारण मुख्यधारा के आर्थिक विकास से पिछड़े रहे। IMT हाईवे के पूरी तरह चालू होने से मणिपुर, नागालैंड, असम, मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश सीधे अंतरराष्ट्रीय व्यापार नेटवर्क से जुड़ जाएंगे।

पूर्वोत्तर भारत अब केवल दक्षिण-पूर्व एशिया का प्रवेश द्वार ही नहीं रहेगा, बल्कि एक बहुत बड़ा लॉजिस्टिक्स और मैन्युफैक्चरिंग हब बनकर उभरेगा। इससे स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के लाखों नए अवसर पैदा होंगे, टूरिज्म (पर्यटन) को अभूतपूर्व बढ़ावा मिलेगा और क्षेत्र में उग्रवाद (Insurgency) को हमेशा के लिए समाप्त करने में मदद मिलेगी।

निशाना 3: आसियान (ASEAN) बाजार में सीधी पहुंच और व्यापार में बड़ा उछाल

भारत और आसियान देशों के बीच व्यापार का एक बड़ा हिस्सा अब तक केवल समुद्री मार्गों पर निर्भर रहा है, जिसमें समय और लागत दोनों ज्यादा लगती है। IMT ट्राइलेटरल हाईवे के जरिए भारत अब सड़क मार्ग से थाईलैंड, म्यांमार और आगे चलकर वियतनाम, लाओस व कंबोडिया तक अपने सामान की सीधी और तेज डिलीवरी कर सकेगा।

सड़क संपर्क बेहतर होने से कृषि उत्पाद, दवाइयां (Pharmaceuticals), ऑटोमोबाइल स्पेयर पार्ट्स और इलेक्ट्रॉनिक सामान का निर्यात कई गुना बढ़ जाएगा। यह हाईवे भारत-आसियान मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को नई ऊर्जा देगा और भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Global Supply Chain) में एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में स्थापित करेगा।

निशाना 4: म्यांमार और मलय प्रायद्वीप में चीन की दादागिरी का माकूल जवाब

दक्षिण-पूर्व एशिया में चीन अपने ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (BRI) और ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ (String of Pearls) नीति के तहत म्यांमार और थाईलैंड में भारी निवेश करके भारत को घेरने की साजिश रचता रहा है। म्यांमार में चीन की उपस्थिति भारत की बंगाल की खाड़ी की सुरक्षा के लिए चुनौती रही है।

IMT प्रोजेक्ट के माध्यम से भारत ने म्यांमार में अवसंरचना निर्माण, पुलों के नवीनीकरण और सड़कों के चौड़ीकरण में बड़ी भूमिका निभाई है। भारत का यह सॉफ्ट-पावर और इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट मॉडल चीन के ‘डेट-ट्रैप’ (कर्ज जाल) नीति का सबसे भरोसेमंद विकल्प बनकर उभरा है। इससे म्यांमार और थाईलैंड जैसे देशों की चीन पर निर्भरता कम हो रही है और क्षेत्र में भारत का सामरिक दबदबा मजबूत हुआ है।

निशाना 5: कंबोडिया, लाओस और वियतनाम (CLMV) तक विस्तार का मास्टरप्लान

भारत की योजना केवल थाईलैंड तक सीमित रहने की नहीं है। रणनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, IMT हाईवे का विस्तार आगे कंबोडिया, लाओस और वियतनाम (CLMV Countries) तक करने का प्रस्ताव है। इस विस्तारित नेटवर्क को ‘ग्रेटर मेकांग सब-रीजन’ (GMS) कनेक्टिविटी से जोड़ा जाएगा।

इसका सीधा अर्थ यह है कि भारत का एक ट्रक मणिपुर से चलकर प्रशांत महासागर के तट पर बसे वियतनाम के बंदरगाहों तक सीधे पहुंच सकेगा। यह कनेक्टिविटी न केवल व्यापार को आसान बनाएगी, बल्कि दक्षिण चीन सागर में चीन के आक्रामक रवैये के खिलाफ भारत को इन देशों के साथ मिलकर एक मजबूत कूटनीतिक गुट बनाने का अवसर देगी।

निशाना 6: ऊर्जा कूटनीति, पर्यटन और सांस्कृतिक संबंधों का पुनरुद्धार

IMT हाईवे सिर्फ गाड़ियों के आने-जाने का रास्ता नहीं है, बल्कि यह ऊर्जा सुरक्षा और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का मार्ग भी है। म्यांमार और थाईलैंड प्राकृतिक गैस और खनिजों के बड़े स्रोत हैं। इस कॉरिडोर के साथ-साथ भविष्य में ऑयल एंड गैस पाइपलाइन और पावर ग्रिड इंटरकनेक्शन स्थापित करने की योजना पर भी विचार किया जा रहा है।

इसके साथ ही, भारत के बौद्ध सर्किट (जैसे बोधगया, सारनाथ) को म्यांमार और थाईलैंड के ऐतिहासिक बौद्ध मठों से जोड़कर ‘स्पिरिचुअल टूरिज्म’ को अभूतपूर्व प्रोत्साहन मिलेगा। दोनों देशों के बीच प्राचीन ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध पुनः जीवित होंगे, जिससे पीपुल-टू-पीपुल (जन-से-जन) संपर्क को मजबूती मिलेगी।

IMT प्रोजेक्ट की राह में मौजूद चुनौतियां और भारत की आगे की रणनीति

हालांकि IMT हाईवे प्रोजेक्ट का अधिकांश हिस्सा बनकर तैयार हो चुका है, लेकिन म्यांमार में पिछले कुछ वर्षों से जारी आंतरिक राजनीतिक अस्थिरता और गृहयुद्ध जैसे हालात के कारण कई स्थानों पर निर्माण कार्य की गति धीमी रही है। म्यांमार के काचिन और कायाह राज्यों में सुरक्षा स्थितियां और दुर्गम पहाड़ी इलाके इस परियोजना के लिए मुख्य चुनौतियां रहे हैं।

फिर भी, भारत सरकार म्यांमार की वर्तमान स्थिति के बीच कूटनीतिक रास्ते निकालकर और सीमावर्ती क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे का काम तेजी से पूरा करके इस प्रोजेक्ट को जल्द से जल्द चालू करने के लिए प्रतिबद्ध है। म्यांमार में कई महत्वपूर्ण पुलों के निर्माण और सड़कों को चार लेन बनाने का काम भारतीय एजेंसियों द्वारा तेजी से निपटाया जा रहा है।

निष्कर्षतः, IMT ट्राइलेटरल हाईवे भारत की विदेश नीति और रक्षा रणनीति का एक ऐसा मास्टरस्ट्रोक है जो आने वाले दशकों में दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के शक्ति संतुलन को पूरी तरह भारत के पक्ष में मोड़ देगा।

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