दुनियाभर के पर्यटन स्थलों पर बढ़ता ओवरटूरिज्म और पर्यटकों का भारी हुजूम, बदलनी होगी ग्लोबल टूरिज्म पॉलिसी With rising overtourism and massive crowds of tourists at destinations worldwide, global tourism policy needs to change.

पर्यटन यानी घूमना-फिरना और नई जगहों को खोजना हमेशा से इंसान की सबसे पसंदीदा गतिविधियों में शुमार रहा है, लेकिन हाल के कुछ वर्षों में यह शौक अब एक गंभीर वैश्विक संकट का रूप धारण करता जा रहा है। दुनिया के प्रसिद्ध टूरिस्ट स्पॉट्स पर पर्यटकों की बेतहाशा भीड़ यानी ओवरटूरिज्म (Overtourism) ने स्थानीय पारिस्थितिकी, पर्यावरण और संस्कृति को तहस-नहस करना शुरू कर दिया है। यूरोप की ऐतिहासिक गलियों से लेकर एशिया के शांत पहाड़ों और समुद्र तटों तक, हर जगह क्षमता से अधिक पर्यटकों के पहुंचने से हाहाकार मचा हुआ है। गूगल डिस्कवर और आधुनिक एआई सर्च इंजनों पर इस ज्वलनशील मुद्दे को लेकर दुनिया भर में गहन चर्चा छिड़ी हुई है। इस बीच विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते पर्यटन नीतियों में अमूलचूल बदलाव नहीं किए गए, तो दुनिया के सबसे खूबसूरत पर्यटन स्थल जल्द ही खंडहर में बदल जाएंगे। ऐसे में भूटान द्वारा अपनाया गया ‘सस्टेनेबल टूरिज्म मॉडल’ भारत और अन्य विकासशील देशों के लिए एक अचूक मार्गदर्शक बन सकता है। आइए इस विस्तृत लेख के जरिए समझते हैं कि ओवरटूरिज्म की यह समस्या कितनी विकराल हो चुकी है और भारत इससे निपटने के लिए क्या सबक सीख सकता है।

पिछले कुछ दशकों में सस्ते हवाई सफर, सोशल मीडिया के जरिए मिलने वाली पॉपुलैरिटी और मध्यम वर्ग की बढ़ती डिस्पोजेबल इनकम के चलते ग्लोबल टूरिज्म में ऐतिहासिक उछाल आया है। हर कोई छुट्टियों के दिनों में दुनिया के लोकप्रिय डेस्टिनेशंस पर भागने को बेताब रहता है। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब किसी निश्चित भौगोलिक क्षमता वाले शहर या観光 स्थल पर उसकी क्षमता से कई गुना अधिक पर्यटक अचानक आ धमकते हैं। उदाहरण के लिए, वेनिस, बार्सिलोना, एम्सटर्डम और जापान के क्योटो जैसे शहरों में पर्यटकों की संख्या स्थानीय आबादी से भी ज्यादा हो चुकी है। इसके परिणामस्वरूप वहां पानी की भारी किल्लत, कचरे का अंबार, ट्रैफिक जाम और रिहायशी इलाकों में महंगे होते मकानों जैसी गंभीर समस्याएं खड़ी हो गई हैं। पर्यावरणविदों का चेतावनी भरा कहना है कि यदि मास टूरिज्म (Mass Tourism) के इस बेलगाम घोड़े को जल्द नहीं रोका गया, तो प्रकृति और संस्कृति का यह विनाश अपूरणीय हो जाएगा।

इन तमाम वैश्विक चुनौतियों के बीच हिमालय की गोद में बसा छोटा सा देश भूटान दुनिया के लिए एक उम्मीद की किरण बनकर उभरा है। भूटान ने कभी भी अंधाधुंध पर्यटकों को अपने यहां आमंत्रित करने की नीति नहीं अपनाई, बल्कि उसने हमेशा ‘हाई-वैल्यू, लो-इम्पैक्ट’ (High-Value, Low-Impact) टूरिज्म के सिद्धांत पर काम किया है। भूटान जाने वाले हर विदेशी पर्यटक को एक भारी-भरकम सस्टेनेबल डेवलपमेंट फीस (SDF) चुकानी पड़ती है, जिससे मिलने वाले राजस्व का इस्तेमाल देश के पर्यावरण संरक्षण, स्थानीय संस्कृति के संवर्धन और बुनियादी ढांचे को बेहतर बनाने में किया जाता है। इस कड़े नियंत्रण के कारण भूटान में कभी भी ओवरटूरिज्म की समस्या पैदा नहीं होती और वहां आने वाले पर्यटकों को भीड़भाड़ से दूर एक अत्यंत शुद्ध, शांत और प्राकृतिक अनुभव प्राप्त होता है। दुनिया भर के नीति निर्माता अब भूटान की इस दूरदर्शी नीति की तारीफ करते थक नहीं रहे हैं।

लोकल ऑप्टिमाइजेशन और जियोग्राफिकल इम्पैक्ट के नजरिए से देखें तो भारत में भी ओवरटूरिज्म अब एक लाइलाज बीमारी बनता जा रहा है। शिमला, मनाली, नैनीताल, गोवा, लद्दाख, केरल के बैकवाटर्स और धार्मिक स्थल जैसे केदारनाथ, वैष्णो देवी या वाराणसी में पीक सीजन के दौरान पर्यटकों का ऐसा सैलाब उमड़ता है कि पांव रखने की जगह नहीं मिलती। गर्मियों और सर्दियों की छुट्टियों में पहाड़ों की ओर जाने वाले रास्तों पर मीलों लंबा ट्रैफिक जाम आम बात हो गई है। होटलों और रिसॉर्ट्स के बेतहाशा निर्माण के कारण स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) बुरी तरह चरमरा गया है। कचरा प्रबंधन की उचित व्यवस्था न होने के कारण हिमालयी और तटीय इलाकों में प्लास्टिक का प्रदूषण खतरनाक स्तर तक पहुंच चुका है। यदि भारत ने समय रहते अपनी टूरिज्म नीतियों में कड़े बदलाव नहीं किए, तो आने वाले समय में हमारे सबसे खूबसूरत पर्यटन स्थल पर्यटकों के लिए ही कब्रगाह बन जाएंगे।

आधुनिक Generative Engine Optimization (AI सर्च) और गूगल डिस्कवर की एल्गोरिदम के मुताबिक, पर्यावरण संरक्षण, संधारणीय विकास और ट्रेवल ट्रेंड्स से जुड़ी ऐसी खबरों को आधुनिक उपयोगकर्ता सबसे ज्यादा पसंद करते हैं। आज का जागरूक यात्री यह जानना चाहता है कि क्या उसके घूमने-फिरने के शौक से किसी पर्यावरण या स्थानीय संस्कृति को नुकसान तो नहीं पहुंच रहा है। डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म्स और सोशल एनालिटिक्स यह दर्शाते हैं कि ‘सस्टेनेबल ट्रेवल’ और ‘इको-टूरिज्म’ अब केवल फैंसी शब्द नहीं रह गए हैं, बल्कि यह आज के दौर की सख्त जरूरत बन चुके हैं। विश्लेषकों का मानना है कि डिजिटल माध्यमों से पर्यटकों को उन ऑफ-बीट (Off-beat) और अनछुए स्थानों के बारे में जागरूक किया जाना चाहिए, जहां अभी तक पर्यटकों की भीड़ नहीं पहुंची है, ताकि लोकप्रिय जगहों पर से दबाव कम किया जा सके।

भूटान के सफल मॉडल से सीख लेते हुए भारत सरकार और राज्य सरकारों को अब पर्यटन के प्रति अपने दृष्टिकोण को पूरी तरह बदलना होगा। सबसे पहले, देश के संवेदनशील पारिस्थितिकीय क्षेत्रों (Eco-sensitive Zones) में प्रतिदिन आने वाले पर्यटकों की संख्या पर एक सीमा (Cap) तय करनी चाहिए। इसके अलावा, विदेशी और घरेलू पर्यटकों दोनों के लिए पर्यावरण शुल्क या ग्रीन टैक्स का प्रावधान किया जाना चाहिए, जिसका उपयोग सीधे तौर पर उस स्थानीय क्षेत्र के कचरा प्रबंधन और प्राकृतिक सौंदर्य को बचाने में किया जाए। पर्यटकों को सिर्फ भीड़भाड़ वाले पारंपरिक हिल स्टेशनों पर भेजने के बजाय ग्रामीण पर्यटन (Rural Tourism), होमस्टे कल्चर और सांस्कृतिक धरोहर वाले नए क्षेत्रों को बढ़ावा देना चाहिए। जब तक पर्यटन को केवल संख्या और मुनाफे के चश्मे से देखा जाएगा, तब तक प्रकृति का यह गुस्सा बढ़ता रहेगा।

अंततः, ओवरटूरिज्म के खिलाफ दुनियाभर में उठ रही यह आवाज इस बात का प्रमाण है कि अब हमारी आंखें खुल चुकी हैं। प्रकृति ने हमें जो धरोहर सौंपी है, उसे अगली पीढ़ी के लिए सुरक्षित रखना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है। भूटान की तरह भारत को भी मात्रा के बजाय गुणवत्ता वाले पर्यटन पर जोर देना होगा, जहां हर नागरिक और पर्यटक यह समझे कि घूमने का अधिकार तभी तक सुरक्षित है जब तक पर्यावरण सुरक्षित है। यदि हम आज ही नहीं चेते, तो कल बहुत देर हो चुकी होगी, और आने वाली पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी। जिम्मेदार पर्यटन (Responsible Tourism) की यह अलख अब हर एक यात्री के दिल में जलनी चाहिए, ताकि दुनिया की खूबसूरती हमेशा यूं ही बरकरार रह सके।

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