वॉशिंगटन, 02 मई 2026 । अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा जर्मनी में तैनात अमेरिकी सैनिकों को वापस बुलाने का फैसला एक बार फिर चर्चा में है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रम्प प्रशासन ने जर्मनी से लगभग 5000 सैनिकों की वापसी का निर्णय लिया था, जिसे दोनों देशों के बीच बढ़ते तनाव के संदर्भ में देखा गया।
अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के मुताबिक यह प्रक्रिया अगले 6 से 12 महीनों में पूरी होगी। यह कदम सीधे तौर पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज के बीच बयानबाजी के बाद सामने आया है।
मर्ज ने पिछले महीने एक कार्यक्रम में कहा था कि अमेरिका के पास कोई अच्छी प्लानिंग नहीं है। उसे पता ही नहीं है कि वह इस जंग से बाहर कैसे निकलेगा। उन्होंने कहा कि ईरान बातचीत को टालने में माहिर है और अमेरिका को बिना नतीजे के इस्लामाबाद तक आना-जाना पड़ा। इससे अमेरिका को ईरान के सामने अपमानित होना पड़ा।
इससे ट्रम्प नाराज हो गए थे। उन्होंने मर्ज को लेकर कहा कि वे बहुत खराब काम कर रहे हैं। उनको लगता है कि ईरान के पास परमाणु हथियार होना अच्छी बात है। उन्हें हकीकत की समझ नहीं है।
यह फैसला मुख्य रूप से रक्षा खर्च को लेकर अमेरिका और जर्मनी के बीच मतभेदों से जुड़ा था। ट्रम्प लंबे समय से NATO सहयोगियों, खासकर जर्मनी, पर रक्षा बजट बढ़ाने का दबाव डालते रहे थे। उनका मानना था कि जर्मनी अपनी सुरक्षा के लिए पर्याप्त खर्च नहीं कर रहा और अमेरिका पर अधिक निर्भर है।
NATO के तहत सदस्य देशों से अपेक्षा की जाती है कि वे अपने GDP का एक निश्चित हिस्सा रक्षा पर खर्च करें। ट्रम्प ने कई बार सार्वजनिक रूप से इस मुद्दे पर जर्मनी की आलोचना की थी, जिसके बाद यह सैन्य निर्णय सामने आया।
हालांकि, इस फैसले को लेकर अमेरिका के भीतर भी मिश्रित प्रतिक्रियाएं देखने को मिली थीं। कुछ विशेषज्ञों ने इसे रणनीतिक रूप से कमजोर कदम बताया, जबकि अन्य ने इसे अमेरिका की “America First” नीति का हिस्सा माना।
बाद में अमेरिकी प्रशासन में बदलाव के साथ इस नीति की समीक्षा भी की गई, लेकिन उस समय यह कदम ट्रम्प की विदेश नीति के एक महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में देखा गया, जिसने ट्रांस-अटलांटिक संबंधों पर गहरा असर डाला।
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