पूज्य सद्गुरुदेव आशिषवचनम्
।। श्री: कृपा ।।
पूज्य “सद्गुरुदेव” जी ने कहा – सेवा परमो धर्म ही हमारी संस्कृति है; सेवा साधना नही है यह साधना का फल है…! सेवा किये बिना कोई साधना सफल नहीं हो सकती। सेवा मानव-जीवन को उत्कृष्ट और पूर्ण बनाने की एक महत्वपूर्ण साधना है। जो फल अनेक तरह की तपश्चर्याओं, साधनाओं, कर्मकाण्ड, उपासनाओं से प्राप्त होता है, वह मनुष्य को सेवा के द्वारा सहज ही मिल जाता है। सेवा का महत्व अपने आप में बहुत बड़ा है। शास्त्रों में सेवा गुण को सर्वोत्तम गुण कहा गया है। जिस व्यक्ति के पास सेवा गुण है उसे सहजता से आवश्यकता अनुसार वस्तुएं प्राप्त हो जाती हैं! सेवा सभी को करनी चाहिए। चाहे घर-परिवार की सेवा हो या समाज, देश अथवा राष्ट्र की सेवा हो। सेवा ईश्वर को रुझाने का अचूक उपाय है। सेवा से ईश्वर भी प्रसन्न होते है। सेवा से ही ब्रह्मविद्या की प्राप्ति होती है और ब्रह्मविद्या से चारो फल (काम, अर्थ, धर्म और मोक्ष ) की प्राप्ति होती है, जिससे मानव जीवन सुखमय होते हुए परम धाम को प्राप्त होता है…।
Related Posts
Comments are closed.