पूज्य सद्गुरुदेव अवधेशानंद जी महाराज आशिषवचनम्

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पूज्य सद्गुरुदेव आशिषवचनम्
           ।। श्री: कृपा ।।
 🌿 पूज्य “सद्गुरुदेव” जी ने कहा – सागर तक पहुंचने के लिए जैसे सरिताओं में तटबंधों का अनुशासन आवश्यक है l उसी प्रकार इष्ट सिद्धि के लिए प्राकृतिक नियमों का निर्वहन, शास्त्र-सम्मत मार्ग का  अनुशीलन और सैद्धांतिक निष्ठा अपेक्षित है …! शास्त्र विचार हमारे जीवन में कब तक आवश्यक हैं? जानते हैं ! जब तक सच्चिदानन्द भगवान से साक्षात्कार न हो जाये। जैसे – भौरा जब तक फूलों पर नहीं बैठता है, तभी तक गुंजार किया करता है और जब भंवरा फूल पर बैठकर मधु का पान करता है तब वह एकदम शांत हो जाता है। फिर भंवरा किसी भी प्रकार का शब्द नहीं करता है। हमारा जीवन भी एक शास्त्र है। जीवन-शास्त्र, जो कर्मों के अक्षरों और भावनाओं की स्याही से लिखा जाता है। जीवन-शास्त्र शांत मन के प्रकाश में पढ़ा जाता है और यह शांत मन सद्विचार एवं सत्कर्मों की निरंतरता का सुफल है। सद्विचार एवं सत्कर्म निरंतर होते रहें, तो जीवन-शास्त्र के सभी अक्षर स्वत: ही अपना मर्म प्रकट कर देते हैं। परन्तु, यदि इसके विपरीत किया जाए तो हमारा सारा जीवन अंधकार, पीड़ा एवं विष से घिर जाता है। इस अंधकार में फिर जीवन का कोई अर्थ प्रकट नहीं होता। बस रह जाती है तो केवल निरर्थकता। इसलिए जो भी सत्य व सार्थकता खोजना चाहते हैं, उन्हें अपने जीवन में सच्चिंतन एवं सत्कर्म की निरंतरता पैदा करनी ही होगी। यदि ऐसा हुआ तो यह लोक और परलोक आनंदपूर्ण हो जाएगा। यदि ऐसा नहीं हो सका, यदि इसके विपरीत हुआ तो न केवल इस लोक में शोक होगा, बल्कि परलोक भी शोकपूर्ण हो जाएगा। व्यक्ति के पुण्य-कर्मों का आनंद सदा उनके साथ चलता है। उसी तरह पाप करने का विषाद भी साथ ही चलता है। इष्ट सिद्धि अर्थात्, पूर्णता की प्राप्ति होना व सफलता की अनुभूति मिलना। इष्ट सिद्धि को प्राप्त करने का मार्ग आध्यात्मिक गलियारे से होकर निकलता है। इसलिए यह मार्ग कठिन तो है, पर जो इस मार्ग पर चलता है वह जीवन की पूर्णता को पा लेता है …।
🌿 पूज्य “आचार्यश्री” जी ने कहा – जो मनुष्य काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि आवेशों से उद्विग्न रहते हैं, वे आत्म-निरक्षण नहीं कर पाते। वे उस पवित्र तत्व को समझ नहीं सकते। कुछ अपने विचारों की संकीर्णता तथा पाण्डित्य के दंभ से अपनी आत्मा को इतना जकड़ लेते हैं कि उनके अन्तरिक्ष में ज्ञान का प्रकाश नहीं घुसने पाता। संकीर्णता, परदोष-दर्शन, दम्भ, क्रमशः रूढ़ियां स्थापित करती हैं, कालान्तर में वे विचार धारा को मिथ्या कल्पना से बाँध लेती हैं, उनका आत्म-निरीक्षण रुक जाता है, ज्ञान का मुक्त प्रवाह अवरुद्ध हो जाता है, वाणी तेजहीन एवं निस्सार हो जाती है। आहार में असावधानी, प्राकृतिक नियमों की उपेक्षा और शक्ति का अपव्यय ही स्वास्थ्य में गिरावट के प्रधान कारण होते हैं। जो लोग अपने स्वास्थ्य पर अधिक ध्यान देते हैं और स्वास्थ्य के नियमों का ठीक-ठीक पालन करते हैं, वे सुदृढ़ एवं निरोग बने रहते हैं। मनुष्य का मन शरीर से भी अधिक शक्तिशाली साधन है। इसके निर्द्वंद्व रहने पर मनुष्य आश्चर्यजनक रूप से उन्नति कर सकता है। किंतु, यह खेद का विषय है कि आज लोगों की मनोभूमि बुरी तरह विकारग्रस्त बनी हुई है। चिंता, भय, निराशा, क्षोभ, लोभ एवं आवेगों का भूकंप उन्हें अस्त-व्यस्त बनाए रखता है। यदि इस प्रचंड मानसिक पवित्रता, उदार भावनाओं और मनःशांति का महत्व अच्छी तरह समझ लिया जाए तथा निःस्वार्थ, निर्लोभ एवं निर्विकारिता द्वारा उसको सुरक्षित रखने का प्रयत्न किया जाए तो मानसिक विकास के क्षेत्र में बहुत दूर तक आगे बढ़ा जा सकता है। अतः गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि केवल परमात्मा के पूजन, ध्यान, स्मरण में लगे रहना ही भक्त होने का लक्षण नहीं है। भक्त वह है, जो द्वेषरहित हो, दयालु हो, सुख-दु:ख में अविचलित रहे, बाहर-भीतर से शुद्ध, सर्वारंभ परित्यागी हो, चिंता व शोक से मुक्त हो, कामनारहित हो, शत्रु-मित्र, मान-अपमान तथा स्तुति-निंदा और सफलता-असफलता में समभाव रखने वाला हो, मननशील हो और हर परिस्थिति में खुश रहने का स्वभाव बनाए रखे …।

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