पूज्य सद्गुरुदेव अवधेशानंद जी महाराज आशिषवचनम्

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पूज्य सद्गुरुदेव आशिषवचनम्
           ।। श्री: कृपा ।।
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 पूज्य “सद्गुरुदेव” जी ने कहा – स्वयं के अविनाशी, नित्य-शाश्वत, सनातन स्वरूप की स्मृति अखण्ड-आनन्द और परम-शान्ति प्रदात्रि है। अत: अस्तित्वबोध के प्रयत्न निरन्तर रहें ..!  मानव जीवन का महती उद्देश्य है – ब्रह्मांड के सत्य को प्रकट करना तथा अपने अन्तस्वरूप को पहचानना। मनुष्य अन्तःकरण में गहनता में वह सारभूत तत्व विद्यमान है जो अदृश्य है, अविनाशी है, शाश्वत है तथा जो एक चिरस्थायी जीवन है। यह हमारा सच्चा स्वरूप है, जिसमें अन्तर का उल्लास है, चिरस्थायी आनंद है और चिरस्थायी प्रशांति है। किन्तु, आज का मानव भौतिक सुख और भोग विलास में इतना लिप्त हो गया है कि वह अपने अंदर छिपे सारभूत तत्व को पूर्णतया भुला बैठा है। शरीर और मन को ही अपना सर्वस्व मान बैठा है जो कि वास्तव में चिंताओं, परेशानियों और नैराश्य को जन्म देता हैं और जो समस्त दु:खों का कारण भी है। मनुष्य अपने सच्चे और चैतन्य स्वरूप को तभी जान सकता है जब मन पूर्णरूप से स्थिर और शांत होगा, जिसे हम आत्मबोध की प्राप्ति कहते हैं। धार्मिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से देखा जाए तो मनुष्य का चरम एवं अंतिम लक्ष्य मोक्ष, कैवल्य अथवा निर्वाण को प्राप्त करना है। मोक्ष आत्मज्ञान की एक ऐसी अवस्था है जहाँ स्वतंत्रता है, समस्त प्रकार के भय, चिंता, पीड़ा आदि से मुक्ति है तथा सभी प्रकार के विषय वासनाओं, विकारों से संबंधित इच्छाओं, आकांक्षाओं, लोभ-मोह आदि से छुटकारा है। परिपूर्ण प्रशांति के साथ समग्रता से जीवन जीना ही मोक्ष है। यही मनुष्य के सच्चे स्वरूप में बने रहना है। आध्यात्मिक दृष्टि से इसे ही अपने अन्तरतम सारतत्व के रूप में ईश्वर को जानना है। अपने आपको उस समयातीत एवं रूपातीत जीवन के एक अविच्छिन्न अंश के रूप में जानना ही सच्चा मोक्ष, कैवल्य अथवा निर्वाण है। फिर ईश्वर को खोजने की कोई आवश्यकता शेष नहीं रहती। ईश्वर की ज्योति आत्म में रहती है। अन्यत्र कहीं नहीं। यह सब प्राणियों में समान रूप से प्रकाशित एवं विद्यमान रहती है और इसे अपने मन को पूर्णतया शांत करके अथवा ध्यान-समाधि की अवस्था में स्वयं अनुभव किया जा सकता है। परमात्मा आत्मा के अन्तरतम गहराई में निवास करता है। परमात्मा अद्वैत है। परमात्मा का ज्ञान तब प्राप्त होता है जब सभी प्रकार की द्वैत भावना उस सर्वोच्च एकत्व में विलीन हो जाती है। अद्वैत वेदांत के अनुसार यह ज्ञान मनुष्य में सदा विद्यमान रहता है। आत्मिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए हमें अपने मन को सब प्रकार के विक्षेपों से रहित करना होगा और हृदय को सब प्रकार के निकृष्ट (भ्रष्ट) विकारों से मुक्त करना होगा। अपने सच्चे स्वरूप की प्रतीति (अनुभूति) होना ही आत्मज्ञान है। आत्मबोध एक अवस्था है जहाँ पर विचार शून्य हो जाते हैं, उस स्तर पर ज्ञाता, ज्ञान एवं ज्ञेय का भेद मिट जाता है। अतः ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय आत्मा के ही स्वरूप हैं और आत्मज्ञान की यह निर्विचार, निर्विकार, निर्विकल्प, निराश्रित अवस्था और उसमें अवस्थित रहना ही पूर्णता की अवस्था है जिसे मोक्ष निर्वाण, या कैवल्य कहा जाता है …।
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 पूज्य “आचार्यश्री” जी ने कहा – अपने वास्तविक स्वरूप की स्मृति और बोध का फलादेश है – निर्भयता और अखण्ड-आनन्द के अनुभव का स्थायी बन जाना। जीव अपने स्वरूप को माया के कारण भूल जाता है। जिस प्रकार सूर्य की किरणें सूर्य से पृथक नहीं हैं, ठीक उसी प्रकार जीव भी वास्तव में ब्रह्म से पृथक नहीं है। अज्ञान के कारण ही जीव अपने उस वास्तविक रूप को नहीं पहचान पाता, जिस अंशी का वह अंश है। चेतन जीव अपना संबंध जड़ शरीर, मन बुद्धि, अहंकार अथवा किसी कल्पित रूप से मान बैठता है। जीव का यह अज्ञान, आत्मज्ञान की कमी के अतिरिक्त कुछ नहीं है। पूज्य “आचार्यश्री” ने कहा – आधुनिक युग में मानव ने अनेक उपलब्धियां हासिल की हैं, लेकिन भौतिक सुख-सुविधाओं के क्षेत्र में उन्नति करने वाला इंसान आध्यात्मिक रूप से पिछड़ता जा रहा है। आज मनुष्य वस्तुओं को ही प्राथमिकता दे रहा है, जबकि आवश्यकता इस बात की है कि हम मानवीय मूल्यों को महत्ता दें जिससे मनुष्यता का सुंदर स्वरूप देखने को मिले। शांति ही हमारा स्वरूप है और जो स्वरूप को ढूंढता है वह शांत है। क्रोध आगंतुक है, बाहर से आता है। जबकि शांति तो हमारा स्वरूप है। चौबीस घंटे क्रोध नहीं किया जा सकता। मगर चौबीस घंटे हम प्रेम में, आनन्द में अथवा शांति में रह सकते हैं। जीव शांति की खोज में भटक रहा है, सुख के पीछे भाग रहा है यह तो ऐसे ही हुआ जैसे कस्तूरी के लिए मृग दौड़ता है और घास सूंघता फिरता है कि यह सुगंध कहां से आ रही है? जबकि कस्तूरी उसकी नाभि में ही है। शांति के लिए आप कुछ न करें, बल्कि जो आप कर रहे हो वह बंद कर दें। ऐसा करने से अपने आप शांति मिलेगी। पानी को गर्म करना पड़ता है, ठंडा अपने आप हो जाता है। स्वरूप से तो हम शांत हैं, जबकि स्वभाव से दु:खी हैं। इसलिए हम अपने कर्मों के कारण अशांत हैं। जो अशांत कर्म की अग्नि जल रही है, यदि उसे बुझा दें तो सदा ही शांति व आत्मसात भाव का अनुभव होने लगेगा …।

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