पूज्य सद्गुरुदेव अवधेशानंद जी महाराज आशिषवचनम्

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पूज्य सद्गुरुदेव आशिषवचनम्
           ।। श्री: कृपा ।।
 पूज्य “सदगुरुदेव” जी ने कहा – सनातन-वैदिक संस्कृति स्वाभाविक एवं नैसर्गिक जीवन धारा है; जहाँ आत्मोन्नयन और लोकोपकार के साथ-साथ समरसता समन्वय, सहअस्तित्व एवं वसुधैव कुटुम्बकम् के भाव निहित हैं। पारस्परिक एकत्व की दिव्य संवेदनाओं को सहजने वाली सनातन वैदिक संस्कृति के उपासक होने पर गौरवान्वित हैं – हम …! भारतीय धर्म व संस्कृति विश्व की प्राचीनतम, आदिकालीन, सर्वोत्कृष्ट, ईश्वरीय ज्ञान वेद और सत्य मान्यताओं व सिद्धान्तों पर आधारित है। सम्पूर्ण विश्व में यही संस्कृति महाभारत काल व उसकी कई शताब्दियों बाद तक भी प्रवृत्त रहने सहित सर्वत्र फलती-फूलती रही है। सनातन’ का अर्थ है – शाश्वत या ‘हमेशा बना रहने वाला’, अर्थात् जिसका न आदि है और न अन्त। जीवन न तो जन्म से शुरू होता है, और न ही मृत्यु पर समाप्त हो जाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने जन्म को अव्यक्त का व्यक्त होना और मृत्यु को व्यक्त का अव्यत्त होना कहा है। आत्मा अतींद्रिय है, इसलिए सामान्य संसारी व्यक्ति, जो प्रत्यक्ष को प्रमाण मानता है, शरीर के अस्तित्व तक ही जीवन को मानता है। सनातन वैदिक धर्म की मान्यता के अनुसार, जन्म-मृत्यु जीवन यात्रा के पड़ाव हैं। जीवनात्मा के जीवन में जन्म-मृत्यु का यह चक्र तब तक चलता रहता है, जब तक वह अपनी आखिरी पड़ाव पर नहीं पहुंच जाता। यह आखिरी पड़ाव ही आत्म साक्षात्कार है अथवा इष्ट की प्राप्ति है। अतः इस उपलब्धि के बाद सारी यात्रा समिट जाती है और इसके बाद कोई कर्तव्य शेष नहीं रह जाता …।
🌿 पूज्य “आचार्यश्री” जी ने कहा – वैदिक-संस्कृति ही सत्य, सनातन है, क्योंकि मनुष्य और उसकी सभ्यता के बारे में सबसे प्राचीन इतिहास भी इसी संस्कृति की देन है। जिसमें ऋषियों द्वारा मानव समाज को व्यवस्थित तरीके से चलाने के लिये मर्यादित आचरण की व्यवस्था दी गयी। जबकि आज के युग में मर्यादा का सर्वथा अभाव है। आज हम जिस युग में साँस ले रहे हैं; वह संघर्ष, स्वार्थ, छल, प्रतिस्पर्धा तथा किसी तरह अपने अस्तित्व को बचाये रखने का युग है। नैतिकता का निरन्तर ह्रास हो रहा है। साथ ही मानवीय संवेदनाओं और भावनाओं की भी कोई कीमत नहीं रह गयी है। हम सभी भौतिकता के कीचड़ में इस प्रकार से ओत-प्रोत हैं कि, आँख उठाकर देखने, सोचने और समझने का समय ही नहीं है। क्षणमात्र के लिए यदि हम इसका चिन्तन करें कि, यह क्या हो रहा है? हम किस तरफ बढ़ रहे हैं? क्या हमारे जीवन का यही लक्ष्य है? और, क्या हमारे जीवन की पूर्णता इसी में है? वर्तमान की सारी समस्याओं के समाधान के सूत्र हमारी संस्कृति में समाये हुए हैं। यही कारण है कि कालान्तर से आज तक वैदिक-संस्कृति ने अपने अस्तित्व को बनाये रखा है, जो आश्चर्यजनक परन्तु अटल सत्य भी है। यदि विश्व भर में इस महान संस्कृति को अपनाया जाये, तो ये सभी को पावन प्रेरणा देती है – “सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे सन्तु निरामया …“ अर्थात्, सभी सुखी रहें और सभी निरोग हों। इतने व्यापक स्तर पर सर्वप्रथम ऐसी कामना, जिसमें मानव-कल्याण निहित हो हमें केवल वैदिक सनातन संस्कृति ही बताती है; अन्य कोई संस्कृति नहीं …।
🌿 पूज्य “आचार्यश्री” जी कहा – मनुष्य को कर्म की स्वतंत्रता है, इसलिए धर्मशास्त्रों की रचना मनुष्य के लिए की गई। सारे विधि-निषेध नियम मनुष्य के लिए बनाए गए। न तो ये पशु-पक्षियों आदि के लिए हैं, और न ही देवताओं के लिए। मनुष्य जीवन की सार्थकता विषय भोगों में लिप्त रहना नहीं है, क्योंकि इस संदर्भ में अन्य योनियों की अपेक्षा मनुष्य अत्यंत निर्बल है। चाहें तो अलग-अलग तुलना करके देख सकते हैं। धर्मशास्त्रों में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चार पुरुषार्थों की चर्चा की गई है। पहले तीन को उन्होंने पुरुषार्थ कहा है जबकि मोक्ष को पर-पुरुषार्थ। इस प्रकार धर्म, अर्थ और काम ये तीन उपलब्धियां हैं – मनुष्य जीवन की। जबकि मोक्ष परम उपलब्धि है। धर्मशास्त्र इस विवेचन द्वारा यह स्पष्ट करते हैं कि यदि ‘मोक्ष’ की उपलब्धि नहीं हुई, तो तीनों की कोई सार्थकता नहीं है। पूज्य “आचार्यश्री” जी के प्रवचनों में इसी यथार्थ को तरह-तरह से समझने का सुअवसर प्राप्त होता है, उनका एक-एक शब्द सम्पूर्ण व्यक्तित्व को गहराई तक छूता है। पूज्य “आचार्यश्री” जी की प्रांजल भाषा का संपूर्ण रूप से स्पर्श करना दुष्कर कार्य है, लेकिन फिर भी साधकों के जनहित के लिए उन्हीं की परम कृपा से समय-समय पर उसे शब्दों में बांधने की और सुगमरूप से प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। पूज्य “आचार्यश्री” जी के अनुसार – शरीर को सजाना-संवारना व्यवहारिक दृष्टि से यह मात्र आत्म प्रवंचना है, स्वयं को धोखा देना है। अपने जीवन में शरीर के बदलाव संकेत देते हैं कि मनुष्य को अपने व्यक्तित्व (चरित्र) को संवारना चाहिए। इसी से लोक-परलोक संवरते हैं। आत्मिक विकास ही सच्चे अर्थों में स्वयं को संवारना है। उन्होंने श्रवण के साथ मनन व निदिध्यासन पर भी जोर दिया है। उनका परामर्श है कि श्रेय मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए जिस तरह संकल्प की आवश्यकता होती, उसे मात्र सत्संग, स्वाध्याय, सेवा और ईश्वर चिंतन से ही प्राप्त किया जा सकता है। अतः आप सबके जीवन में श्रेय का मार्ग प्रशस्त हो, यही पूज्य “आचार्यश्री” जी की हम सबके लिए शुभकामनाएं हैं …।

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